18 सितंबर को याद आता है चेंदरू मंडावी का नाम—वही बच्चा जिसकी बाघ के शावक से दोस्ती ने उसे दुनिया भर में मशहूर कर दिया था; फिल्म बनी, Cannes पहुंची, किताब लिखी गई… लेकिन कैमरा बंद होने के बाद चेंदरू की कहानी कितनी बदल गई, यही सबसे दिलचस्प हिस्सा है
कुछ कहानियां समय के साथ पुरानी नहीं होतीं।
बस उन्हें सुनाने की वजह बदल जाती है।
18 सितंबर चेंदरू मंडावी की पुण्यतिथि है। यही वह तारीख है, जब बस्तर के उस बच्चे को फिर याद करने का मौका आता है, जिसकी जिंदगी इतनी असाधारण थी कि अगर इसे किसी फिल्म की कहानी बताया जाए तो शायद दर्शक कहे—“इतना भी फिल्मी मत बनाओ!”
लेकिन चेंदरू की कहानी में कुछ भी बनाया हुआ नहीं था।
एक आदिवासी बच्चा।
बस्तर का जंगल।
एक बाघ का शावक।
दोनों की दोस्ती।
एक विदेशी फिल्मकार।
एक फिल्म।
Cannes Film Festival।
और फिर…
शोहरत के बाद आई एक ऐसी खामोशी, जिसके बारे में दुनिया ने बहुत कम सुना।
चेंदरू को दुनिया ने ‘Tiger Boy’ कहा था।
लेकिन आज उन्हें सिर्फ टाइगर बॉय कहकर याद करना उनकी पूरी कहानी के साथ नाइंसाफी होगी।
क्योंकि चेंदरू की असली कहानी उस दिन शुरू नहीं हुई थी, जब कैमरा उनके सामने आया।
वह उस दिन शुरू हुई थी, जब एक छोटे से बस्तर के बच्चे ने एक बाघ के बच्चे को दोस्त मान लिया था।
चेंदरू और टेम्बू: जब बाघ डर नहीं, दोस्त था
चेंदरू मंडावी बस्तर के मुरिया आदिवासी समाज से आते थे। उनकी दुनिया आज के शहरों में पले बच्चे की दुनिया से बिल्कुल अलग थी।
जंगल उनके आसपास था।
प्रकृति जिंदगी का हिस्सा थी।
और इसी दुनिया में एक दिन बाघ का एक शावक उनकी जिंदगी में आया।
उसका नाम रखा गया टेम्बू।
कहानी यहीं से ऐसी हो गई, जिस पर आज भी भरोसा करना मुश्किल लगता है।
चेंदरू और टेम्बू साथ घूमते थे।
साथ खेलते थे।
चेंदरू उसके साथ जंगल में जाते थे।
जिस जानवर को आज हम जंगल की सबसे खतरनाक प्रजातियों में गिनते हैं, चेंदरू के बचपन में वह एक साथी बन चुका था।
और शायद इस रिश्ते की सबसे खूबसूरत बात यही थी कि चेंदरू के लिए इसमें कुछ असाधारण था ही नहीं।
दुनिया को बाघ दिख रहा था, चेंदरू को दोस्त।
फिर बस्तर पहुंचा एक ऐसा फिल्मकार, जिसने इस दोस्ती में कहानी देख ली
स्वीडिश फिल्मकार अर्ने सक्सडॉर्फ प्रकृति और इंसान के रिश्ते को कैमरे में कैद करने के लिए पहले से मशहूर थे।
जब उन्हें बस्तर और चेंदरू की कहानी के बारे में पता चला, तो वह भारत आए।
लेकिन उन्हें यहां सिर्फ एक बच्चे और बाघ की दोस्ती नहीं मिली।
उन्हें मिला एक पूरा संसार।
बस्तर का जंगल।
मुरिया समाज।
उनकी जीवनशैली।
शिकार।
परंपराएं।
प्रकृति के साथ उनका रिश्ता।
और उस दुनिया के बीच चेंदरू।
सक्सडॉर्फ ने इस अनुभव को कैमरे में उतारा और 1957 में बनी फिल्म—
‘The Flute and the Arrow’
यह 75 मिनट की स्वीडिश फिल्म थी। चेंदरू इसमें खुद ‘The Boy’ के रूप में नजर आए।
और इस कहानी में एक और बेहद दिलचस्प नाम जुड़ा—
पंडित रविशंकर।
फिल्म का संगीत उन्हीं से जुड़ा था।
यानी बस्तर की कहानी अब एक ऐसे फ्रेम में पहुंच चुकी थी, जिसमें स्वीडिश सिनेमा, भारतीय संगीत और एक आदिवासी बच्चे की जिंदगी एक साथ आ गई थी।
चेंदरू को अभिनय करना ही नहीं पड़ा
आज किसी बच्चे को कैमरे के सामने सहज दिखाने के लिए कई टेक लगते हैं।
निर्देशक कहते हैं—इधर देखो।
उधर देखो।
यह बोलो।
ऐसे चलो।
ऐसे मुस्कुराओ।
चेंदरू के मामले में कहानी उलटी थी।
उन्हें चेंदरू बनने की जरूरत नहीं थी। वे पहले से चेंदरू थे।
उनका जंगल असली था।
उनका जीवन असली था।
उनकी भाषा असली थी।
और टेम्बू के साथ उनका रिश्ता किसी फिल्म की स्क्रिप्ट नहीं था।
कैमरे ने सिर्फ उस जिंदगी को रिकॉर्ड किया, जो वह पहले से जी रहे थे।
शायद यही वजह थी कि फिल्म में चेंदरू की मौजूदगी आज भी इतनी अलग लगती है।
वह अभिनय करते हुए बच्चा नहीं लगते।
वह अपनी जिंदगी जीता हुआ बच्चा लगता है।
फिर बस्तर से निकलकर चेंदरू पहुंच गए Cannes
अब कहानी में वह मोड़ आता है, जहां शायद खुद चेंदरू को भी समझ नहीं आया होगा कि उनकी जिंदगी कितनी दूर निकल चुकी है।
1958 का Cannes Film Festival।
The Flute and the Arrow वहां आधिकारिक प्रतियोगिता में दिखाई गई।
सोचिए—
जिस बच्चे की दुनिया बस्तर के जंगलों तक थी, उसकी कहानी अब यूरोप के प्रतिष्ठित फिल्म समारोह में दिखाई जा रही थी।
चेंदरू की तस्वीरें लोगों तक पहुंचीं।
उनकी कहानी लोगों ने सुनी।
और उनके लिए एक नाम चल पड़ा—
Tiger Boy
एक ऐसा नाम, जो आने वाले दशकों तक उनके साथ जुड़ा रहा।
लेकिन यहां एक बात साफ करना जरूरी है।
चेंदरू वाली फिल्म ऑस्कर विजेता नहीं थी।
अर्ने सक्सडॉर्फ को ऑस्कर मिला था, लेकिन वह उनकी 1948 की फिल्म ‘Symphony of a City’ के लिए था, जिसे 1949 के Academy Awards में सम्मानित किया गया था।
चेंदरू की The Flute and the Arrow की अपनी उपलब्धि कम नहीं थी—1958 Cannes तक पहुंचना अपने आप में बेहद बड़ी बात थी।
और चेंदरू के लिए तो यह किसी सपने से कम नहीं रहा होगा।
Cannes के बाद कहानी किताब में भी चली गई
चेंदरू की कहानी फिल्म के पर्दे तक सीमित नहीं रही।
स्वीडिश लेखिका और फोटोग्राफर एस्ट्रिड बर्गमैन सक्सडॉर्फ, जो अर्ने सक्सडॉर्फ की पत्नी थीं, ने चेंदरू की कहानी पर किताब लिखी—
‘Chendru: The Boy and the Tiger’
1960 में प्रकाशित इस किताब में चेंदरू, टेम्बू और बस्तर की दुनिया की तस्वीरें भी शामिल थीं।
यानी एक बच्चा, जो शायद अपने गांव के बाहर की दुनिया से ज्यादा परिचित भी नहीं था, अब—
फिल्म में था।
किताब में था।
अंतरराष्ट्रीय दर्शकों की याद में था।
लेकिन जिंदगी का सबसे अजीब खेल यहीं शुरू हुआ।
क्योंकि प्रसिद्धि जितनी तेजी से आई थी…
उतनी ही तेजी से गुजर भी गई।
विदेश की दुनिया देखी, लेकिन आखिर लौटे बस्तर
चेंदरू स्वीडन भी गए।
एक ऐसी दुनिया में, जो उनके बस्तर से बिल्कुल अलग थी।
नई भाषा।
नई संस्कृति।
नई जिंदगी।
लेकिन वह हमेशा के लिए वहां नहीं रहे।
आखिरकार चेंदरू वापस बस्तर लौट आए।
और यहीं कहानी अचानक फिल्मी चमक छोड़कर जमीन पर आ जाती है।
Cannes पीछे छूट चुका था।
फिल्म पीछे छूट चुकी थी।
विदेश पीछे छूट चुका था।
और धीरे-धीरे दुनिया भी आगे बढ़ गई।
लेकिन चेंदरू के लिए एक चीज और खत्म हो चुकी थी।
टेम्बू।
जिस बाघ के शावक के साथ उनकी दोस्ती ने उन्हें दुनिया तक पहुंचाया था, वह हमेशा उनके साथ नहीं रह सका।
और टेम्बू के जाने के साथ चेंदरू की जिंदगी का वह अध्याय भी बंद हो गया, जिसने उन्हें दुनिया के सामने ला खड़ा किया था।
दुनिया के लिए ‘Tiger Boy’, बस्तर के लिए सिर्फ चेंदरू
यही शायद चेंदरू की कहानी का सबसे भावुक हिस्सा है।
दुनिया के पास उनका एक नाम था—
Tiger Boy।
लेकिन अपने लोगों के बीच वह किसी फिल्म के किरदार नहीं थे।
वह चेंदरू थे।
अपने गांव के।
अपने जंगल के।
अपने समाज के।
अपनी मिट्टी के।
और यही वजह है कि चेंदरू की कहानी को सिर्फ ‘बच्चा और बाघ’ वाली रोमांचक कहानी बनाकर छोड़ देना गलत होगा।
इसके भीतर बस्तर की संस्कृति है।
एक आदिवासी समाज की दुनिया है।
प्रकृति के साथ एक अलग तरह का रिश्ता है।
और सबसे बढ़कर है—एक ऐसे इंसान की कहानी, जिसकी जिंदगी को दुनिया ने कुछ वर्षों के लिए बहुत करीब से देखा और फिर लगभग भूल गई।
चेंदरू की कहानी को ‘मोगली’ कहना आसान है, समझना मुश्किल
चेंदरू को कई बार बस्तर का ‘मोगली’ कहा गया।
नाम सुनने में अच्छा लगता है।
लेकिन दोनों कहानियों में जमीन-आसमान का अंतर है।
मोगली कल्पना था। चेंदरू हकीकत।
मोगली का जंगल कहानी की किताब में था।
चेंदरू का जंगल उनकी जिंदगी था।
मोगली को लेखक ने बनाया था।
चेंदरू को बस्तर ने बनाया था।
इसलिए चेंदरू को मोगली कह देना शायद आसान है।
लेकिन चेंदरू को चेंदरू समझना ज्यादा जरूरी है।
और फिर आया जिंदगी का सबसे मुश्किल दौर
अंतरराष्ट्रीय पहचान के बावजूद चेंदरू का बाद का जीवन उस चमक से बहुत दूर था, जो उनकी जवानी के दिनों में उनके आसपास थी।
वह अपने बस्तर लौट आए थे।
साधारण जिंदगी जीते रहे।
समय के साथ उनकी आर्थिक परेशानियों और स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों की खबरें भी सामने आईं।
जिस इंसान की तस्वीर कभी दुनिया के सामने छपी थी, उसके जीवन के अंतिम वर्षों में मदद की जरूरत तक महसूस हुई।
यह विरोधाभास चुभता है।
जिस चेंदरू को दुनिया ने कैमरे में अमर कर दिया, उसकी अपनी जिंदगी कैमरे से बाहर कितनी कठिन हो गई थी।
18 सितंबर 2013 को चेंदरू मंडावी का निधन हो गया।
उनकी उम्र को लेकर अलग-अलग पुराने विवरण मिलते हैं, लेकिन इतना तय है कि वह अपने जीवन के अंतिम वर्षों में बस्तर में ही रहे और वहीं उनकी कहानी का आखिरी अध्याय लिखा गया।
चेंदरू क्यों जरूरी हैं, आज भी?
क्योंकि उनकी कहानी सिर्फ अतीत नहीं है।
आज जब हम आदिवासी संस्कृति, बस्तर, जंगल और स्थानीय पहचान की बात करते हैं, तब चेंदरू की कहानी एक पुराने आईने की तरह सामने आती है।
1950 के दशक में दुनिया ने बस्तर को एक बच्चे के जरिए देखा।
लेकिन सवाल यह है—
क्या हमने बस्तर को उस बच्चे के बाद भी उसी तरह देखने की कोशिश की?
चेंदरू की कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि किसी इलाके की पहचान सिर्फ उसके जंगल या खनिज से नहीं होती।
कभी-कभी उसकी पहचान किसी इंसान से बनती है।
और चेंदरू उन चेहरों में से एक हैं।
हेमंत पाणिग्रही के लिए चेंदरू सिर्फ इतिहास नहीं
आज हेमंत पाणिग्रही छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी हैं। इससे पहले वह लंबे समय तक पत्रकारिता से जुड़े रहे हैं और 25 साल से अधिक का पत्रकारिता अनुभव रखते हैं।
बस्तर से उनका अपना जुड़ाव इस कहानी को उनके लिए और ज्यादा निजी बनाता है।
क्योंकि चेंदरू को बाहर से देखने वाला व्यक्ति शायद सबसे पहले देखेगा—
बच्चा + बाघ + फिल्म + Cannes।
लेकिन बस्तर को भीतर से जानने वाला व्यक्ति इसके पीछे देखता है—
एक समाज, एक संस्कृति, एक जंगल और उस मिट्टी का एक बेटा।
चेंदरू की कहानी पर लंबे समय से अध्ययन और रिपोर्टिंग करने वाले पाणिग्रही के नजरिए में यह कहानी सिर्फ अंतरराष्ट्रीय शोहरत की नहीं है।
यह उस बस्तर की कहानी है, जिसकी असली खूबसूरती को समझने के लिए सिर्फ कैमरा नहीं, संवेदना और जमीन से जुड़ाव भी चाहिए।
और शायद यही चेंदरू को लेकर उनका सबसे भावुक पक्ष है—
दुनिया ने चेंदरू में ‘Tiger Boy’ देखा, लेकिन बस्तर ने उसमें अपना बेटा देखा।
केदार कश्यप ने भी चेंदरू को याद किया
चेंदरू की पुण्यतिथि पर छत्तीसगढ़ के वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप ने उन्हें याद किया।
चेंदरू को याद करने का महत्व इसलिए भी बड़ा है क्योंकि वह सिर्फ किसी पुरानी फिल्म के कलाकार नहीं थे।
वह नारायणपुर और बस्तर की ऐसी पहचान बन गए थे, जिसका नाम देश से निकलकर विदेश तक पहुंचा।
उनकी कहानी में बस्तर की मिट्टी थी।
उसका जंगल था।
उसकी संस्कृति थी।
और एक ऐसा बच्चा था, जिसने अनजाने में अपने साथ अपने पूरे इलाके को दुनिया के सामने पहुंचा दिया।
केदार कश्यप की ओर से चेंदरू को याद किए जाने का भाव इसी विरासत से जुड़ता है—बस्तर के उस बेटे को याद करना, जिसने बहुत छोटी उम्र में अपनी असाधारण कहानी से दुनिया का ध्यान खींचा।
चेंदरू की कहानी का असली ‘ट्विस्ट’ क्या है?
यह नहीं कि एक बच्चा बाघ के साथ खेलता था।
यह भी नहीं कि उसकी फिल्म Cannes पहुंच गई।
असली ट्विस्ट तो यह है कि—
जिस शोहरत ने चेंदरू को दुनिया तक पहुंचाया, वह उनकी जिंदगी भर उनके साथ नहीं रही।
दुनिया ने कुछ समय के लिए उन्हें अपना लिया।
फिर दुनिया आगे बढ़ गई।
लेकिन चेंदरू वहीं रहे।
अपने बस्तर में।
अपनी मिट्टी में।
और शायद इसी वजह से उनकी कहानी आज भी पढ़ते हुए कुछ भीतर छू जाती है।
क्योंकि यह सिर्फ सफलता की कहानी नहीं है।
यह उस इंसान की कहानी है जिसे दुनिया ने बहुत जल्दी खोज लिया और बहुत जल्दी खो भी दिया।
और अंत में… चेंदरू को ‘Tiger Boy’ नहीं, चेंदरू की तरह याद कीजिए
कभी बस्तर के जंगल में एक बच्चा चलता था।
उसके साथ एक बाघ का शावक चलता था।
बच्चे के लिए वह दोस्त था।
दुनिया के लिए वह सनसनी बन गया।
एक फिल्मकार ने उसे कैमरे में कैद किया।
फिल्म Cannes पहुंची।
किताब लिखी गई।
दुनिया ने नाम दिया—
Tiger Boy।
लेकिन कहानी का सबसे खूबसूरत हिस्सा शायद वह था, जब कैमरा वहां नहीं था।
जब कोई विदेशी दर्शक तालियां नहीं बजा रहा था।
जब कोई फिल्म समारोह उसका नाम नहीं पुकार रहा था।
जब चेंदरू बस अपने जंगल में था।
अपने दोस्त की याद के साथ।
और शायद आज, उनकी पुण्यतिथि पर, उन्हें याद करने का सबसे सही तरीका यही है—
उनकी कहानी को सिर्फ एक ‘आदिवासी बच्चे और बाघ’ की सनसनी न बनाएं।
उसे उस बस्तर की कहानी की तरह पढ़ें, जिसने एक बच्चे को दुनिया तक पहुंचाया।
दुनिया ने उसे Tiger Boy कहा था।
बस्तर के लिए वह हमेशा चेंदरू था।
और शायद यही उनकी सबसे बड़ी पहचान थी।