रेटिंग: ⭐⭐ (2/5)
अवधि: 2 घंटे 23 मिनट
शैली: क्राइम थ्रिलर, ड्रामा
निर्देशक: मेघना गुलजार
कलाकार: करीना कपूर खान, पृथ्वीराज सुकुमारन, जितेंद्र जोशी, क्षिति जोग, प्रगति मिश्रा
मेघना गुलजार की ‘दायरा’ ऐसी फिल्म है जो आपको शुरुआत में कॉलर पकड़कर कहती है—“बैठिए, आज कानून, न्याय और गुस्से की क्लास लगेगी।” समस्या बस इतनी है कि क्लास अच्छी शुरू होने के बाद बीच-बीच में लेक्चर कुछ ज्यादा लंबा हो जाता है।
फिल्म का मुद्दा गंभीर है, सवाल असहज करने वाले हैं और पृथ्वीराज सुकुमारन ऐसा अभिनय करते हैं कि कई बार लगता है आदमी बोल कम और अंदर ही अंदर प्रेशर कुकर ज्यादा बन रहा है। लेकिन जहां फिल्म को धारदार बहस और तेज स्क्रीनप्ले चाहिए था, वहां यह कई बार अपनी ही गंभीरता में फंस जाती है।
यानी मसाला कम, सवाल ज्यादा… और जवाब? वो आपको खुद तलाशने पड़ेंगे।
कहानी: जब जनता को न्याय चाहिए और पुलिस को सच
कहानी एक युवती के साथ हुए जघन्य अपराध और उसके बाद चार आरोपियों के पुलिस एनकाउंटर के इर्द-गिर्द घूमती है।
डीसीपी रमन कुमार (पृथ्वीराज सुकुमारन) उन पुलिस अधिकारियों में हैं जिन्हें जनता अपराधियों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई करने वाला हीरो मानती है। एनकाउंटर के बाद लोगों को लगता है कि आखिरकार न्याय मिल गया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। असली पेंच यहीं से शुरू होता है।
मामले की जांच की जिम्मेदारी डीसीपी अजूनी कोहली (करीना कपूर खान) को मिलती है। अजूनी का सवाल सीधा है—अगर अपराधियों ने अपराध किया भी है, तो क्या पुलिस को कानून से बाहर जाकर सजा देने का अधिकार मिल जाता है?
बस फिर क्या है। एक तरफ रमन का तर्क है कि अपराध के सामने सिस्टम की सुस्ती कब तक देखी जाए। दूसरी तरफ अजूनी कहती हैं कि कानून का रास्ता मुश्किल हो सकता है, लेकिन उसे छोड़ देने का मतलब क्या होगा?
और यहीं फिल्म का असली ‘दायरा’ सामने आता है—कानून और बदले के बीच की वह पतली रेखा, जिसे पार करना आसान है लेकिन वापस लौटना शायद उतना आसान नहीं।
एक्टिंग: पृथ्वीराज ने फिल्म को कंधे पर उठा लिया
साफ बात—पृथ्वीराज सुकुमारन फिल्म के सबसे मजबूत खिलाड़ी हैं।
रमन कुमार के किरदार में उन्होंने चिल्लाकर नहीं, बल्कि अपनी आंखों और चेहरे की बेचैनी से काम लिया है। उनका किरदार बाहर से नियंत्रित दिखता है, लेकिन अंदर गुस्सा लगातार उबलता रहता है।
उनका अभिनय इतना संयमित है कि कई दृश्यों में संवाद से पहले ही समझ आ जाता है कि दिमाग में क्या चल रहा है।
करीना कपूर खान के पास अजूनी कोहली के रूप में एक दिलचस्प किरदार है, लेकिन स्क्रीनप्ले उन्हें उतनी जगह नहीं देता जितनी इस टकराव को चाहिए थी। कुछ जगह उनका प्रदर्शन प्रभावी है, लेकिन किरदार और कहानी के बीच वह पकड़ पूरी तरह नहीं बन पाती।
जितेंद्र जोशी और बाकी सपोर्टिंग कलाकार फिल्म के माहौल को विश्वसनीय बनाए रखते हैं। क्षिति जोग भी भावनात्मक हिस्सों में असर छोड़ती हैं।
निर्देशन: मेघना गुलजार का इरादा मजबूत, लेकिन रफ्तार कभी-कभी हाथ से निकलती है
मेघना गुलजार की खासियत रही है कि वह अपराध को सिर्फ अपराध की तरह नहीं देखतीं। उसके पीछे छिपे सिस्टम, समाज और इंसानी मानसिकता को भी खंगालती हैं।
‘दायरा’ में भी यही कोशिश है।
फिल्म यह नहीं पूछती कि सिर्फ अपराधी कौन है। यह पूछती है कि न्याय आखिर किसे कहते हैं?
लेकिन दिक्कत यह है कि फिल्म जिस धार के साथ अपना सवाल रखती है, उसी धार के साथ हर जगह आगे नहीं बढ़ पाती।
कुछ हिस्सों में तनाव जबरदस्त बनता है, जबकि कुछ जगह फिल्म जरूरत से ज्यादा ठहर जाती है।
स्टोरीलाइन: सवाल शानदार, लेकिन कहानी हर मोड़ पर उतनी चौंकाती नहीं
फिल्म का मूल विचार मजबूत है।
एक तरफ कानून की किताब है और दूसरी तरफ जनता का गुस्सा। एक तरफ पुलिस का दावा है कि उसने न्याय दिलाया, दूसरी तरफ सवाल है कि क्या न्याय की प्रक्रिया को दरकिनार किया जा सकता है?
यही कॉन्फ्लिक्ट फिल्म की जान है।
लेकिन कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, कई जगह ऐसा लगता है कि फिल्म अपने केंद्रीय मुद्दे से थोड़ा भटक रही है। जो बहस बेहद तीखी हो सकती थी, वह कई बार समझाने वाली लगने लगती है।
स्क्रीनप्ले: यहीं फिल्म सबसे ज्यादा फिसलती है
‘दायरा’ की सबसे बड़ी कमजोरी इसका स्क्रीनप्ले है।
फिल्म में कंटेंट की कमी नहीं है। कमी है उस कंटेंट को लगातार कसकर पकड़कर रखने की।
कुछ सीक्वेंस बेहद प्रभावी हैं, लेकिन उनके बीच की गति असमान महसूस होती है। जिस समय दर्शक कहानी को और तेज होते देखना चाहता है, फिल्म थोड़ा ब्रेक लगा देती है।
और क्राइम थ्रिलर में यह छोटी बात नहीं है।
आप दर्शक से कह रहे हैं कि “सच क्या है, जानना है तो बैठे रहिए”, तो फिर हर कुछ मिनट में उसकी जिज्ञासा को और बढ़ाना भी पड़ेगा।
टेक्निकल पहलू: माहौल फिल्म के पक्ष में
फिल्म का ट्रीटमेंट काफी गंभीर और यथार्थवादी है। कैमरा और बैकग्राउंड स्कोर कहानी को ग्लैमराइज करने के बजाय उसके भारीपन को बनाए रखते हैं।
फिल्म में अनावश्यक चमक-दमक नहीं है और यही इसकी खूबी है।
एक्शन या चेज वाले हिस्सों में फिल्म थोड़ी जान पकड़ती है और कुछ सीक्वेंस वाकई प्रभाव छोड़ते हैं।
कमियां: फिल्म को थोड़ा और ‘दायरा’ छोटा करना चाहिए था
सबसे पहली कमी—रफ्तार।
2 घंटे 23 मिनट की फिल्म में कई जगह ऐसा लगता है कि एडिटर कैंची लेकर बैठा था, लेकिन फिर किसी ने कहा होगा—“रहने दो, बात जरूरी है।”
दूसरी कमी—करीना के किरदार का इस्तेमाल।
इतनी बड़ी अभिनेत्री को लेकर जब आप ऐसा गंभीर कॉप-ड्रामा बनाते हैं, तो दर्शक उनके किरदार से ज्यादा की उम्मीद करता है।
तीसरी कमी—फिल्म का नैतिक संघर्ष बेहद दिलचस्प है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच बहस को और ज्यादा धार मिल सकती थी।
म्यूजिक: यहां गाने कहानी पर हावी नहीं होते
‘दायरा’ में संगीत कहानी को रोककर अपना अलग शो नहीं करता। फिल्म का मूड गंभीर है और संगीत भी उसी माहौल को सपोर्ट करता है।
यहां गानों से ज्यादा बैकग्राउंड स्कोर और साउंड डिजाइन का महत्व है, क्योंकि फिल्म का तनाव उसी से बनता है।
फाइनल वर्डिक्ट
‘दायरा’ देखिए अगर आपको ऐसी फिल्में पसंद हैं जो थिएटर से निकलने के बाद भी दिमाग में सवाल छोड़ जाएं; लेकिन अगर आप तेज रफ्तार क्राइम थ्रिलर की उम्मीद लेकर जा रहे हैं, तो यह फिल्म आपको बीच-बीच में घड़ी देखने पर मजबूर कर सकती है।
⭐ रेटिंग: 2/5
किसके लिए: मेघना गुलजार, पृथ्वीराज और गंभीर क्राइम ड्रामा पसंद करने वालों के लिए।
किसके लिए नहीं: जिन्हें हर दस मिनट में नया ट्विस्ट और तेज रफ्तार चाहिए।