रणवीर सिंह की ‘धुरंधर’ और ‘धुरंधर: द रिवेंज’ ने बॉक्स ऑफिस पर ऐसा तूफान खड़ा किया कि फिल्म को भारत की ऑस्कर एंट्री के दावेदारों में देखना स्वाभाविक था। लेकिन जब 99वें अकादमी अवॉर्ड्स के लिए भारत की आधिकारिक एंट्री का ऐलान हुआ, तो बाजी रणवीर की फिल्म ने नहीं, बल्कि मराठी फिल्म ‘गोंधल’ ने मार ली।
और अब इस फैसले के पीछे की कहानी भी सामने आ गई है।
आखिर धुरंधर को क्यों नहीं चुना गया?
फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया की 14 सदस्यीय जूरी के सदस्य विवेक वासवानी ने चयन प्रक्रिया पर बात करते हुए बताया कि जूरी के कुछ सदस्यों को ‘धुरंधर’ पसंद आई थी, लेकिन पैनल ने उसे ऑस्कर के लिए पर्याप्त मजबूत विकल्प नहीं माना।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 14 सदस्यीय जूरी में फिल्म को सिर्फ 4 वोट मिले।
यानी जिस फिल्म ने सिनेमाघरों में दर्शकों से जबरदस्त प्यार पाया, वही फिल्म ऑस्कर के लिए बनी जूरी की कसौटी पर उस तरह नहीं उतर सकी, जैसा उसे उम्मीद थी।
बॉक्स ऑफिस की बादशाहत और ऑस्कर की कसौटी अलग है
यहीं पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प ट्विस्ट है।
ऑस्कर के लिए भारत की आधिकारिक फिल्म चुनते समय सिर्फ यह नहीं देखा जाता कि फिल्म ने कितने करोड़ कमाए या दर्शकों ने उसे कितना पसंद किया। सवाल यह होता है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की पहचान और संस्कृति को कौन-सी फिल्म सबसे प्रभावी तरीके से पेश कर सकती है।
जूरी के मुताबिक, ‘धुरंधर’ और उसका सीक्वल उस खास सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व की उम्मीद पर खरे नहीं उतर पाए, जिसे वे भारत की आधिकारिक ऑस्कर एंट्री में तलाश रहे थे।
इसलिए मामला ‘फिल्म अच्छी थी या खराब’ का नहीं था। मामला था—ऑस्कर के लिए भारत की तरफ से कौन-सी फिल्म सबसे सही प्रतिनिधि बन सकती है?
फिर ‘गोंधल’ ने कैसे बाजी मार ली?
इस साल कुल 33 फिल्मों पर विचार किया गया। इनमें हिंदी के साथ-साथ मराठी, तेलुगु, तमिल, गुजराती, मलयालम, नेपाली और अन्य भारतीय भाषाओं की फिल्में शामिल थीं।
अंतिम मुकाबले में ‘गोंधल’ के साथ ‘अंग’ और ‘मैं वापस आऊंगा’ जैसी फिल्में भी पहुंचीं। आखिरकार संतोष डावखर की मराठी फिल्म को भारत की आधिकारिक एंट्री चुना गया।
‘गोंधल’ की सबसे बड़ी ताकत शायद यही है कि इसकी कहानी और उसका संसार बेहद स्थानीय होते हुए भी एक व्यापक मानवीय अनुभव से जुड़ता है।
फिल्म महाराष्ट्र की पारंपरिक गोंधल लोक परंपरा और धार्मिक अनुष्ठान की पृष्ठभूमि में बुनी गई है। इसमें लोक संस्कृति, रिश्ते, इच्छा, धोखा और तनाव को थ्रिलर के अंदाज में पेश किया गया है।
फिल्म में किशोर कदम, इशिता देशमुख, योगेश सोहोनी, निषाद भोईर और अनुज प्रभु जैसे कलाकार हैं, जबकि संगीत दिग्गज इलैयाराजा ने दिया है।
यानी ऑस्कर की जूरी को यहां सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की एक विशिष्ट दुनिया भी दिखाई दी।
‘गोंधल’ की राह पहले से बन रही थी
दिलचस्प बात यह है कि ‘गोंधल’ का ऑस्कर तक पहुंचना अचानक हुआ चमत्कार नहीं है।
संतोष डावखर की फिल्म को फिल्म फेस्टिवल सर्किट में भी पहचान मिली। 2025 में 56वें इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया में डावखर को सिल्वर पीकॉक से सम्मानित किया गया था।
अब वही फिल्म भारत की ओर से ऑस्कर के मंच तक पहुंच गई है।
यह मराठी सिनेमा के लिए भी खास पल है। इससे पहले ‘श्वास’ (2004), ‘हरिश्चंद्राची फैक्ट्री’ (2009) और ‘कोर्ट’ (2015) भारत की आधिकारिक ऑस्कर एंट्री बन चुकी हैं।
तो क्या धुरंधर की ऑस्कर की कहानी पूरी तरह खत्म?
नहीं।
यहीं कहानी में एक और छोटा-सा ट्विस्ट है।
99वें ऑस्कर के नियमों के मुताबिक, इंटरनेशनल फीचर फिल्म के लिए आधिकारिक राष्ट्रीय चयन के अलावा एक दूसरा रास्ता भी मौजूद है—अगर कोई गैर-अंग्रेजी फिल्म निर्धारित प्रमुख अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में से किसी एक में संबंधित क्वालिफाइंग अवॉर्ड जीतती है, तो वह उस आधार पर भी विचार के लिए पात्र हो सकती है।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि ‘धुरंधर’ अब सीधे ऑस्कर की दौड़ में शामिल हो गई है। उसके लिए संबंधित नियमों और पात्रता शर्तों को पूरा करना जरूरी होगा।
असली सवाल: क्या ऑस्कर के लिए ‘धुरंधर’ गलत फिल्म थी?
यहां जवाब थोड़ा पेचीदा है।
दर्शकों के लिए नहीं। जूरी के लिए शायद हां।
‘धुरंधर’ ने साबित कर दिया कि वह दर्शकों को बड़े पैमाने पर सिनेमाघरों तक खींच सकती है। लेकिन ऑस्कर की इंटरनेशनल फीचर कैटेगरी में सवाल सिर्फ मनोरंजन का नहीं होता। वहां फिल्म की कहानी, कलात्मकता, सांस्कृतिक संदर्भ और दुनिया के सामने उसके असर को भी देखा जाता है।
इसलिए ‘धुरंधर’ का ऑस्कर के लिए न चुना जाना उसकी बॉक्स ऑफिस सफलता को कम नहीं करता।
बस इतना जरूर बताता है कि बॉक्स ऑफिस की ट्रॉफी और ऑस्कर की ट्रॉफी तक पहुंचने का रास्ता एक जैसा नहीं होता।
और फिलहाल उस रास्ते पर भारत की तरफ से रणवीर सिंह नहीं, बल्कि ‘गोंधल’ आगे बढ़ रही है।