‘हां, मैं दिमागी नक्सल हूं’, नसीरुद्दीन शाह ने सरकार को ललकारा, बोले, ‘टुकड़े टुकड़े गैंग तो ये है’
नसीरुद्दीन शाह ने खुद को ‘दिमागी नक्सल’ कहे जाने पर गर्व जताते हुए केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। जामिया, जेएनयू और सत्यजीत रे फिल्म संस्थान के छात्रों के समर्थन में दिए बयान ने नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है।
बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता नसीरुद्दीन शाह एक बार फिर अपने बयान को लेकर चर्चा में हैं। इस बार उन्होंने ‘दिमागी नक्सल’ कहे जाने पर नाराजगी जताने के बजाय इसे गर्व से अपनाया है। सोशल मीडिया पर जारी एक वीडियो में शाह ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला और छात्रों के समर्थन में खुलकर अपनी बात रखी। उनके बयान ने एक बार फिर बहस छेड़ दी है कि सरकार की आलोचना करने वालों को इस तरह के तमगे देना कहां तक सही है और क्या विरोध की आवाज को देशविरोधी विचारधारा से जोड़ना उचित है?
शाह ने अपने वीडियो में कहा कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ कहे जाने पर गर्व है। उन्होंने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि अगर कोई ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’ है, तो वह मौजूदा सरकार है। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक और सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई है। जहां कुछ लोग इसे सत्ता से सवाल पूछने की हिम्मत बता रहे हैं, वहीं आलोचकों के लिए यह बयान एक बार फिर शाह की राजनीतिक टिप्पणियों को लेकर बहस का विषय बन गया है।
‘दिमागी नक्सल’ वाली बहस में नसीरुद्दीन शाह की एंट्री
दरअसल, ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर विवाद तब बढ़ा, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में इस शब्द का इस्तेमाल किया था। उन्होंने कहा था कि सशस्त्र नक्सलवाद कमजोर पड़ रहा है, लेकिन नक्सली विचारधारा से प्रभावित लोग अब भी देश में अशांति फैलाने की कोशिश कर सकते हैं। उन्होंने ऐसे लोगों की पहचान कर उन्हें अलग थलग करने की बात कही थी।
इसके बाद इस शब्द को लेकर राजनीतिक बहस शुरू हो गई। विपक्षी नेताओं और कई आलोचकों ने सवाल उठाया कि क्या सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वाले लोगों को भी इस श्रेणी में रखा जाएगा? सोशल मीडिया पर भी इस शब्द को लेकर मीम्स और तंज सामने आए। भाजपा के कुछ सोशल मीडिया हैंडल से विपक्षी नेताओं और सरकार के आलोचकों को निशाना बनाते हुए पोस्ट किए गए, जिस पर पत्रकारों और राजनीतिक नेताओं ने आपत्ति जताई।
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने बाद में स्पष्ट किया था कि सरकार की आलोचना करने भर से किसी को ‘दिमागी नक्सल’ नहीं कहा जाना चाहिए। उनके मुताबिक, यह शब्द उन लोगों के लिए है जो नक्सली विचारधारा, अलगाववाद या संविधान के खिलाफ गतिविधियों का समर्थन करते हैं।
यानी जिस शब्द को लेकर पहले से राजनीतिक घमासान चल रहा था, अब नसीरुद्दीन शाह ने उसी को अपने बयान का केंद्र बना दिया है।
जामिया, जेएनयू और फिल्म संस्थान के छात्रों के समर्थन में क्या बोले शाह?
नसीरुद्दीन शाह ने अपने वीडियो में जामिया मिल्लिया इस्लामिया, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट का जिक्र किया। उन्होंने आरोप लगाया कि शिक्षा संस्थानों और छात्रों की आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है।
शाह ने कहा कि देश के युवाओं का हौसला तोड़ने, शिक्षा संस्थानों को कमजोर करने और लोकतंत्र को खतरे में डालने की कोशिशों का विरोध होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि छात्रों के साथ जो हो रहा है, उसे लोग याद रखेंगे और इतिहास में दर्ज किया जाएगा।
वीडियो में शाह ने भाजपा की आईटी सेल पर भी निशाना साधा। उनका कहना था कि आलोचकों के खिलाफ माहौल बनाने और उन्हें अलग अलग नामों से निशाना बनाने से लोकतांत्रिक आवाजें खत्म नहीं होंगी।
उनका संदेश साफ था, सरकार और उसके समर्थक चाहे कितनी भी कोशिश कर लें, छात्रों की आवाज और लोकतंत्र में असहमति की जगह खत्म नहीं की जा सकती।
‘टुकड़े टुकड़े गैंग’ वाले बयान पर क्यों बढ़ सकता है विवाद?
नसीरुद्दीन शाह का बयान इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि उन्होंने उस राजनीतिक शब्दावली को पलटकर इस्तेमाल किया है, जिसका इस्तेमाल अक्सर सरकार के आलोचकों के खिलाफ किया जाता रहा है।
शाह ने कहा कि अगर देश को बांटने वाला कोई समूह है, तो वह सरकार है। यह एक तीखा राजनीतिक आरोप है, जो उनके विरोधियों को पसंद नहीं आएगा। उनके समर्थक इसे सत्ता से सवाल पूछने का अधिकार बता सकते हैं, लेकिन आलोचकों का तर्क हो सकता है कि एक अभिनेता को राजनीतिक असहमति जताते समय शब्दों के चयन में संतुलन रखना चाहिए।
यहां असली सवाल भी यही है कि क्या सरकार की आलोचना को राष्ट्रविरोधी सोच से जोड़ना सही है, और क्या सरकार पर हमला करते समय विरोधियों को भी उसी तरह के तीखे तमगे देना बहस को और ध्रुवीकृत नहीं करता?
नसीरुद्दीन शाह के बयान को इसी राजनीतिक संदर्भ में देखना होगा। उनकी बात से सहमत होना या असहमत होना अलग मुद्दा है, लेकिन इस पूरे विवाद में असहमति और देशविरोध के बीच की सीमा पर चर्चा जरूरी हो जाती है।
नसीरुद्दीन शाह पहले भी अपने बयानों को लेकर रहे हैं चर्चा में
नसीरुद्दीन शाह उन अभिनेताओं में शामिल हैं, जो फिल्मों के अलावा सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर भी अपनी राय रखते रहे हैं। कई बार उनके बयान चर्चा में आए हैं और कई बार उन्हें सोशल मीडिया पर आलोचना का सामना भी करना पड़ा है।
उनके समर्थक उन्हें बेबाक आवाज मानते हैं, जो लोकप्रियता या संभावित आलोचना की परवाह किए बिना अपनी बात रखते हैं। वहीं, उनके आलोचक मानते हैं कि वह कई बार राजनीतिक मुद्दों पर जरूरत से ज्यादा तीखी भाषा का इस्तेमाल करते हैं और उनकी टिप्पणियां विवाद को बढ़ाती हैं।
इस बार भी प्रतिक्रिया दो हिस्सों में बंटी नजर आ रही है। एक पक्ष उनके बयान को लोकतांत्रिक अधिकारों और छात्रों के समर्थन में उठाई गई आवाज के रूप में देख रहा है। दूसरा पक्ष इसे सरकार के खिलाफ एक और राजनीतिक हमला मान रहा है।
सोशल मीडिया पर इस तरह के बयान अक्सर कुछ ही घंटों में समर्थन, विरोध, मीम्स और व्यक्तिगत टिप्पणियों में बंट जाते हैं। ऐसे में मूल मुद्दा, यानी छात्रों के विरोध और शिक्षा संस्थानों की स्वतंत्रता से जुड़े सवाल, कई बार पीछे छूट जाते हैं।
क्या ‘दिमागी नक्सल’ अब राजनीतिक बहस का नया हथियार बन गया है?
‘दिमागी नक्सल’ शब्द पर चल रही बहस अब केवल नक्सलवाद या सुरक्षा तक सीमित नहीं रह गई है। यह सवाल भी उठ रहा है कि राजनीतिक विरोध, वैचारिक असहमति और हिंसक विचारधारा के समर्थन के बीच अंतर कैसे किया जाए।
सरकार का पक्ष है कि नक्सली विचारधारा और अलगाववाद का समर्थन करने वालों की पहचान जरूरी है। दूसरी तरफ आलोचकों का कहना है कि ऐसे शब्दों का इस्तेमाल व्यापक रूप से सरकार के विरोधियों को बदनाम करने के लिए नहीं होना चाहिए।
नसीरुद्दीन शाह का ताजा बयान इसी टकराव को और तेज करता है। उन्होंने खुद को ‘दिमागी नक्सल’ कहे जाने पर गर्व जताकर इस लेबल को चुनौती देने की कोशिश की है। हालांकि, उनका बयान भी अपनी तीखी राजनीतिक भाषा के कारण आलोचना से अछूता नहीं रहेगा।
फिलहाल इतना साफ है कि नसीरुद्दीन शाह ने एक बार फिर ऐसा मुद्दा उठा दिया है, जिस पर बॉलीवुड से लेकर राजनीति और सोशल मीडिया तक बहस होगी। लेकिन इस शोर के बीच सबसे अहम सवाल यही है कि क्या लोकतंत्र में सरकार से असहमति जताने वालों को बिना ठोस आधार के किसी खांचे में डालना सही है, और क्या राजनीतिक बहस में एक दूसरे को कठघरे में खड़ा करने से समस्या का कोई हल निकलेगा?
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Rajni
Official editorial writer covering cinema box office, OTT streaming releases, Bollywood & Hollywood news, and pop culture for OnscreenBuzz.com.
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