नई दिल्ली: OTT प्लेटफॉर्म पर दिखाए जाने वाले कंटेंट को लेकर एक बार फिर सेंसरशिप की बहस तेज हो गई है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने OTT कंटेंट की निगरानी और रेगुलेशन को लेकर एक पैनल बनाया है। यह पैनल इस बात पर सुझाव देगा कि OTT पर दिखाए जाने वाले कंटेंट में अश्लीलता, भारतीय संस्कृति के खिलाफ सामग्री, एंटी-नेशनल कंटेंट या बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव डालने वाली चीजों को किस तरह नियंत्रित किया जा सकता है।
RSS से जुड़े लोगों का मानना है कि OTT के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए कंटेंट पर ज्यादा सख्त निगरानी की जरूरत है। संघ प्रमुख मोहन भागवत भी पहले डिजिटल और OTT कंटेंट को लेकर चिंता जाहिर कर चुके हैं।
क्या OTT के लिए बनेगा सेंसर बोर्ड?
फिलहाल OTT के लिए फिल्मों के CBFC जैसा कोई सेंसर बोर्ड नहीं बनाया गया है। RSS का पैनल इस मुद्दे पर अपनी सिफारिशें तैयार करेगा। इसके बाद सरकार के सामने किस तरह का regulatory framework रखा जाएगा, यह स्पष्ट होगा।
अगर फिल्मों की तरह pre-release certification की व्यवस्था लागू होती है, तो OTT पर रिलीज होने वाली फिल्मों और वेब सीरीज को दर्शकों के लिए उपलब्ध कराने से पहले उनकी समीक्षा और certification की जरूरत पड़ सकती है।
हालांकि, OTT को पूरी तरह unregulated समझना सही नहीं होगा। मौजूदा IT Rules के तहत OTT platforms के लिए age classification, content descriptors और शिकायतों के निपटारे के लिए तीन-स्तरीय grievance redressal mechanism पहले से मौजूद है।
एक्सपर्ट बोले- OTT पर सेंसरशिप जरूरी
ट्रेड एनालिस्ट अतुल मोहन ने दैनिक भास्कर से बातचीत में OTT पर सेंसरशिप की जरूरत का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि सिर्फ सिनेमाघरों में दिखाई जाने वाली फिल्मों पर ही सेंसर क्यों हो, फिल्म चाहे OTT पर देखी जाए या कहीं और, सेंसर जरूरी है।
उनके मुताबिक भारत जैसे बड़े और विविधता वाले देश में यह पहले से तय करना मुश्किल है कि कौन-सा कंटेंट कब और किस समुदाय की भावनाओं को प्रभावित कर सकता है। उनका मानना है कि पहले भी कंटेंट को लेकर कई विवाद सामने आ चुके हैं।
'क्रिएटिव फ्रीडम का मतलब अश्लीलता नहीं'
वहीं फिल्ममेकर विवेक शर्मा, जो भूतनाथ के डायरेक्टर हैं, OTT पर बढ़ी creative freedom को लेकर अलग नजरिया रखते हैं।
उनका कहना है कि लोगों को उम्मीद थी कि थिएटर में जिन्हें creative freedom नहीं मिल रही थी, उन्हें OTT पर ज्यादा आजादी मिलेगी। लेकिन कई मामलों में इस आजादी का इस्तेमाल अश्लीलता दिखाने के लिए किया गया।
यही वजह है कि OTT को लेकर बहस सिर्फ सेंसरशिप की नहीं, बल्कि creative freedom और social responsibility के बीच balance की भी है।
OTT के लिए अलग सेंसर बोर्ड की जरूरत या मौजूदा सिस्टम को मजबूत करना बेहतर?
कानूनी और डिजिटल मीडिया विशेषज्ञों के बीच भी इस बात पर चर्चा है कि OTT के लिए फिल्मों जैसा pre-certification system कितना प्रभावी होगा।
एक पक्ष का मानना है कि OTT का कंटेंट घरों तक सीधे पहुंचता है और बच्चे भी आसानी से इसे access कर सकते हैं, इसलिए age-rating और parental controls को ज्यादा मजबूत करने की जरूरत है।
दूसरा पक्ष मानता है कि अगर हर शो या फिल्म को रिलीज से पहले सरकारी certification से गुजरना पड़ा, तो इससे creative freedom और ऐसे कंटेंट पर असर पड़ सकता है जो सामाजिक या राजनीतिक मुद्दों पर सवाल उठाता है।
इसलिए विशेषज्ञों के बीच एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या OTT पर pre-censorship लागू करने की बजाय मौजूदा age-rating, parental control और complaint redressal system को ज्यादा प्रभावी बनाया जाए?
फिल्मों और OTT में क्या है अंतर?
सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली फिल्मों को CBFC यानी Central Board of Film Certification से certification लेना अनिवार्य है। बिना certification के किसी फिल्म को थिएटर में रिलीज नहीं किया जा सकता।
इसके विपरीत OTT पर रिलीज होने वाली फिल्मों और वेब सीरीज को CBFC से certification लेने की जरूरत नहीं होती।
हालांकि OTT platforms को Information Technology Rules के तहत अपने कंटेंट की age classification करनी होती है और दर्शकों को content descriptors की जानकारी देनी होती है।
पिछले दो सालों में 50 OTT प्लेटफॉर्म हटाए गए
OTT कंटेंट को लेकर सरकार के पास लंबे समय से शिकायतें आती रही हैं। अश्लील और आपत्तिजनक कंटेंट के खिलाफ सरकार ने कई OTT platforms, websites और social media accounts पर कार्रवाई की है।
सरकार के मुताबिक पिछले दो वर्षों में करीब 50 OTT platforms को unlawful या obscene content से जुड़े मामलों में हटाया गया है।
इस साल की शुरुआत में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने पांच online streaming platforms—MoodXVIP, Koyal PlayPro, Digi Movieplex, Feel और Jugnu—को ब्लॉक किया था। सरकार के अनुसार इन platforms पर अश्लील और आपत्तिजनक कंटेंट दिखाया जा रहा था, जो IT Act 2000, IT Rules 2021 और अन्य संबंधित कानूनों का उल्लंघन करता था।
इससे पहले जुलाई 2025 में Ullu-ALT समेत 25 OTT platforms पर भी कार्रवाई की गई थी। मार्च 2024 में सरकार ने अश्लील कंटेंट के आरोप में 18 OTT platforms को ब्लॉक किया था। इसके साथ 19 websites, 10 apps और 57 social media handles के खिलाफ भी कार्रवाई की गई थी।
भारत में OTT की शुरुआत कब हुई?
भारत में OTT का शुरुआती दौर 2008 के आसपास शुरू हुआ। Reliance Entertainment ने BigFlix लॉन्च किया था, जिसे भारत के शुरुआती OTT platforms में गिना जाता है।
इसके बाद 2010 में Digivive ने NexGTV लॉन्च किया। यह भारत के शुरुआती OTT mobile apps में शामिल था।
IPL ने OTT को दी नई पहचान
भारत में OTT की लोकप्रियता बढ़ाने में क्रिकेट का बड़ा योगदान रहा। 2013 और 2014 में NexGTV ने IPL की live streaming की।
इसके बाद 2015 में IPL की digital streaming ने Hotstar को तेजी से लोकप्रिय बनाया। आगे चलकर यही platform Disney+ Hotstar के नाम से जाना गया।
TV शोज भी OTT पर आने लगे
2013 के आसपास DittoTV और SonyLIV जैसे platforms ने TV content को digital platforms पर उपलब्ध कराना शुरू किया। दर्शकों को पहली बार अपने पसंदीदा TV shows को अपनी सुविधा के मुताबिक देखने का विकल्प बड़े पैमाने पर मिलने लगा।
इसके बाद Netflix, Amazon Prime Video, ZEE5 और Disney+ Hotstar जैसे platforms ने भारतीय OTT market को और बड़ा बनाया।
कोरोना काल में OTT की लोकप्रियता में आया उछाल
2020 में कोरोना महामारी और lockdown के दौरान OTT platforms की popularity में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई।
रिपोर्ट्स के मुताबिक lockdown के शुरुआती महीनों में OTT platforms को 2019 के आखिरी तीन महीनों की तुलना में ज्यादा views मिले। इसी दौरान ZEE5 और Amazon Prime Video जैसे platforms के subscribers में भी बड़ी वृद्धि दर्ज की गई।
Invest India की रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना काल में Amazon Prime, Netflix और Disney+ Hotstar जैसे OTT platforms पर users का time spent तेजी से बढ़ा। YouTube जैसे free-access platforms पर भी भारतीय दर्शकों का समय बढ़ा।
अब आगे क्या?
RSS का पैनल इस पूरे मुद्दे पर अपनी recommendations तैयार करेगा। इसके बाद यह साफ होगा कि OTT के लिए किस तरह के regulatory model की मांग की जाती है।
बहस अब सिर्फ इस बात पर नहीं है कि OTT पर सेंसरशिप होनी चाहिए या नहीं। असली सवाल यह है कि बच्चों को inappropriate content से कैसे बचाया जाए, दर्शकों की शिकायतों पर तेजी से कार्रवाई कैसे हो और साथ ही filmmakers और creators की creative freedom भी बरकरार रहे।