कहानी छुपाना और कहानी न होना दो अलग बातें हैं... क्या यश की फिल्म ने स्टाइल के चक्कर में सबसे बड़ी गलती कर दी?
ट्रेलर खत्म होता है, लेकिन कहानी शुरू ही नहीं होती
यश की KGF के बाद यह उनकी सबसे बड़ी वापसी मानी जा रही है। महीनों से फिल्म को लेकर ऐसा माहौल बनाया गया जैसे भारतीय सिनेमा का अगला बड़ा धमाका आने वाला हो। लेकिन Toxic का ट्रेलर देखने के बाद पहला एहसास उत्साह का नहीं, बल्कि उलझन का होता है। चार मिनट अड़तीस सेकंड का समय किसी ट्रेलर के लिए काफी होता है कि वह दर्शक को फिल्म की दुनिया, उसके संघर्ष और उसके किरदारों से जोड़ दे। यहां ट्रेलर सिर्फ इतना बताता है कि फिल्म बहुत महंगी दिखती है। कहानी क्या है, यह बताने में वह लगभग नाकाम रहता है।
कहानी से ज्यादा फ्रेम सजाने में व्यस्त दिखे मेकर्स
ट्रेलर में अपराध की दुनिया है। ड्रग माफिया है। सत्ता का खेल है। रिश्ते हैं। हिंसा है। लेकिन इन सबके बीच कोई ऐसा मजबूत धागा नहीं मिलता जो दर्शक को पकड़कर पूरी यात्रा कराए। एक दृश्य खत्म होता है, दूसरा शुरू हो जाता है। फिर तीसरा। फिर चौथा। लेकिन इन सबको जोड़ने वाला भावनात्मक प्रवाह कहीं नजर नहीं आता। ऐसा लगता है जैसे कई शानदार दृश्य जोड़कर ट्रेलर बना दिया गया हो और यह उम्मीद कर ली गई हो कि दर्शक खुद ही कहानी बना लेगा।
यश स्क्रीन पर हैं, लेकिन उनका किरदार पर्दे के पीछे रह जाता है
यश का स्क्रीन प्रेजेंस हमेशा की तरह दमदार है। कैमरा उन्हें बड़े स्टार की तरह पेश करता है और वह हर फ्रेम में प्रभाव छोड़ते हैं। लेकिन अभिनय और स्टारडम दो अलग बातें हैं। ट्रेलर यह नहीं बता पाता कि उनका किरदार आखिर किस दर्द से गुजर रहा है, उसका मकसद क्या है और उसकी लड़ाई क्यों महत्वपूर्ण है। जब दर्शक किरदार को समझ ही नहीं पाएगा तो उसके लिए ताली किस बात पर बजाएगा।
इतनी बड़ी स्टारकास्ट, लेकिन किसी का किरदार याद नहीं रहता
नयनतारा, कियारा आडवाणी, हुमा कुरैशी, तारा सुतारिया और रुक्मिणी वसंत जैसे नाम ट्रेलर में मौजूद हैं, लेकिन अफसोस, किसी को भी ऐसा पल नहीं मिलता जो फिल्म देखने की उत्सुकता बढ़ा दे। सभी खूबसूरत फ्रेम का हिस्सा जरूर बनते हैं, लेकिन कहानी का हिस्सा कम लगते हैं। ट्रेलर खत्म होने के बाद अगर दर्शक किसी किरदार का नाम तक याद न रख पाए, तो यह प्रचार की सबसे बड़ी कमजोरी मानी जाएगी।
हर तीस सेकंड में गोलीबारी... फिर भी रोमांच गायब
एक्शन की भरमार है। गोलियां हैं। खून है। विस्फोट हैं। स्लो मोशन है। लेकिन जब हर दृश्य खुद को पिछले दृश्य से बड़ा साबित करने की कोशिश करता है, तब कोई भी दृश्य खास नहीं रह जाता। ट्रेलर धीरे धीरे एक जैसे दृश्यों का दोहराव बन जाता है। एक्शन का असर तभी होता है जब उसके पीछे कहानी हो। यहां कहानी पीछे छूट जाती है और सिर्फ तमाशा बचता है।
तकनीकी टीम ने पूरी मेहनत की, लेकिन पटकथा की झलक कमजोर
सिनेमैटोग्राफी बेहतरीन है। हर फ्रेम पोस्टर जैसा दिखता है। प्रोडक्शन डिजाइन और लाइटिंग अंतरराष्ट्रीय स्तर की महसूस होती है। बैकग्राउंड स्कोर कई जगह दृश्य को बड़ा बना देता है। तकनीकी विभाग में शिकायत करना मुश्किल है। लेकिन यही सबसे बड़ी विडंबना भी है। जब कैमरा, संगीत और विजुअल्स लगातार प्रभावित करें और कहानी पीछे रह जाए, तो फिल्म सिर्फ दिखने में बड़ी लगती है, महसूस होने में नहीं।
सबसे बड़ी चिंता यही है कि हाइप कहानी से बड़ी न हो जाए
ट्रेलर बार बार यह भरोसा दिलाने की कोशिश करता है कि यह बहुत बड़ी फिल्म है। लेकिन वह एक बार भी यह भरोसा नहीं दिला पाता कि यह बहुत अच्छी कहानी भी सुनाने वाली फिल्म है। रहस्य और भ्रम में बहुत फर्क होता है। यहां कई जगह रहस्य नहीं, बल्कि भ्रम ज्यादा पैदा होता है। दर्शक के मन में उत्सुकता से ज्यादा सवाल बचते हैं।
OnScreenBuzz Verdict
Toxic का ट्रेलर आंखों पर असर डालता है, लेकिन दिमाग पर नहीं। यह तकनीकी रूप से शानदार है, लेकिन भावनात्मक रूप से लगभग खाली महसूस होता है। यश की मौजूदगी, बड़ा बजट और शानदार विजुअल्स पूरी कोशिश करते हैं कि कहानी की कमी छिप जाए, लेकिन चार मिनट अड़तीस सेकंड के बाद भी अगर दर्शक यही पूछे कि "आखिर फिल्म है किस बारे में?", तो ट्रेलर अपना सबसे जरूरी काम अधूरा छोड़ देता है।
फिलहाल Toxic का ट्रेलर एक ऐसे खूबसूरत गिफ्ट पैक जैसा लगता है, जिसकी पैकिंग बेहद आकर्षक है, लेकिन अंदर क्या है, उसका भरोसा अब भी नहीं बनता।