दृश्यम द कॉन्क्लूजन रिव्यू: अजय देवगन और जयदीप अहलावत की भिड़ंत दमदार, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले ने विजय सलगांवकर की आखिरी बाजी फीकी कर दी
दृश्यम द कॉन्क्लूजन में 23 जुलाई का रहस्य कहानी में नया ट्विस्ट लाता है, लेकिन सुविधाजनक ट्विस्ट और कमजोर इमोशनल कनेक्ट पुराने दृश्यम वाला जादू बरकरार नहीं रख पाते।
रेटिंग: ⭐⭐⭐/5 | अवधि: 2 घंटे 30 मिनट
दृश्यम की सबसे बड़ी खूबी हमेशा यही रही कि कहानी देखने के बाद भी दिमाग चलता रहता था। विजय सलगांवकर ने ऐसा क्या सोचा होगा? पुलिस से एक कदम आगे रहने के लिए उसने क्या जुगाड़ लगाया होगा? लेकिन दृश्यम द कॉन्क्लूजन में ये रोमांच तो है, मगर हर मोड़ पर वो पुराना वाला झटका नहीं मिलता।
इस बार कहानी 2 अक्टूबर से आगे बढ़कर 23 जुलाई पर अटकती है। इसी तारीख की एक नई कड़ी विजय की सालों पुरानी बनाई कहानी को फिर से सवालों के घेरे में ले आती है। और यहीं एंट्री होती है क्राइम ब्रांच एसपी राजवीर की, जिसका किरदार जयदीप अहलावत ने निभाया है।
राजवीर को यकीन है कि विजय की कहानी में कुछ ऐसा छिपा है, जो अब तक पुलिस की नजर से बचता आया है। अब एक तरफ विजय है और दूसरी तरफ राजवीर। दोनों की लड़ाई बंदूक या मारधाड़ की नहीं, दिमाग की है।
और यही फिल्म का सबसे मजबूत हिस्सा है।
विजय के सामने इस बार आसान शिकार नहीं
अजय देवगन एक बार फिर विजय सलगांवकर में लौटे हैं और किरदार की सबसे बड़ी ताकत वही पुरानी खामोशी है। विजय ज्यादा बोलता नहीं, सफाई देने की कोशिश नहीं करता और सामने वाले को जितना कम बताए, उतना बेहतर समझता है।
अजय ने इसी restraint को फिर अच्छे से पकड़ा है।
लेकिन जयदीप अहलावत की एंट्री फिल्म को नया रंग देती है। राजवीर ऐसा पुलिस अफसर नहीं है जो हर बात पर आवाज ऊंची करे। वह चुपचाप विजय को पढ़ने की कोशिश करता है और यही ठहराव दोनों के आमने सामने वाले सीन्स को दिलचस्प बनाता है।
कई बार ऐसा लगता है कि विजय कुछ छिपा रहा है और राजवीर को बस उस एक छोटी सी दरार का इंतजार है।
अजय और जयदीप की यही acting jugalbandi फिल्म को उसके कमजोर हिस्सों से निकालती रहती है।
23 जुलाई वाला खेल कितना काम करता है?
कहानी का सबसे बड़ा नया hook 23 जुलाई है। फिल्म इस तारीख को धीरे धीरे mystery की तरह सामने लाती है और दर्शक भी जानना चाहता है कि आखिर इस दिन ऐसा क्या हुआ था।
शुरुआत में फिल्म थोड़ा समय लेती है। लेकिन जैसे जैसे राजवीर की जांच आगे बढ़ती है, कहानी में curiosity बढ़ती जाती है।
दिक्कत ये है कि जिस तरह पहले दृश्यम में विजय की planning दर्शक को लगातार surprise करती थी, इस बार वैसा असर हर जगह नहीं आता।
कुछ twists अच्छे हैं, लेकिन कुछ जगह कहानी को आगे बढ़ाने के लिए चीजें जरूरत से ज्यादा convenient लगती हैं।
यानी सवाल तो पैदा होता है, लेकिन हर सवाल का जवाब मिलने पर “वाह!” वाली feeling नहीं आती।
परिवार वाला इमोशन इस बार हल्का
पहले दो पार्ट्स में Vijay Salgaonkar की पूरी कहानी का emotional centre उसका परिवार था। इस बार विजय ज्यादा strategist नजर आता है और कम family man।
श्रीया सरन की नंदिनी के पास पहले के मुकाबले कम करने को है। हालांकि उन्हें एक ऐसा मौका मिलता है जहां उनका दर्द साफ दिखाई देता है।
तब्बू और रजत कपूर भी सीमित स्क्रीन टाइम में अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं।
प्रकाश राज के इंद्रजीत शेट्टी को कोर्टरूम वाले हिस्सों में ज्यादा असरदार स्पेस मिलता है और वह फिल्म के conflict को वजन देते हैं।
गायतोंडे फिर काम का मसाला
टेंशन लगातार बनाए रखना आसान नहीं होता, इसलिए फिल्म बीच बीच में गायतोंडे (कमलेश सावंत) को लेकर आती है।
2 अक्टूबर से जुड़े रेफरेंस, पाव भाजी और पुराने किस्सों के जरिए गायतोंडे कहानी में हल्का फुल्का humour लेकर आते हैं।
ये छोटे moments फिल्म को बहुत ज्यादा गंभीर होने से बचाते हैं।
असली कमी कहां है?
फिल्म का पहला हिस्सा अजय देवगन और जयदीप अहलावत की वजह से मजबूत बना रहता है। लेकिन बीच के हिस्से में रफ्तार थोड़ी गिरती है।
कुछ scenes ऐसे लगते हैं जिन्हें थोड़ा छोटा किया जा सकता था।
और सबसे बड़ी बात, विजय की planning में वो पुराना surprise factor कम हो गया है।
पहली फिल्मों में दर्शक कई बार विजय से एक कदम पीछे रह जाता था। यहां कुछ जगह दर्शक उसके साथ साथ चल रहा होता है।
यही फर्क इस फिल्म को अच्छी thriller से शानदार thriller बनने से रोकता है।
डायरेक्शन और टेक्निकल काम
फिल्म का direction पुराने फॉर्मूले को जस का तस दोहराने के बजाय कहानी को एक अलग रास्ते पर ले जाने की कोशिश करता है। यह अच्छी बात है।
Goa को सिर्फ खूबसूरत location की तरह इस्तेमाल नहीं किया गया। माहौल में suspense बनाए रखने के लिए locations और framing का अच्छा इस्तेमाल हुआ है।
Editing ज्यादातर जगह crisp है, हालांकि बीच के हिस्से में थोड़ी trimming फिल्म को और tight बना सकती थी।
और यहां अमर मोहिले का background score खास तौर पर तारीफ का हकदार है। कई scenes में suspense को असली push background score से मिलता है। बिना कुछ दिखाए भी score बेचैनी पैदा कर देता है।
‘मुस्कुरा दो’ फिल्म के emotional हिस्से में अपनी जगह बनाता है, लेकिन इस फिल्म का असली musical weapon background score ही है।
Final Verdict
दृश्यम द कॉन्क्लूजन खराब फिल्म नहीं है। बल्कि इसमें एक नया mystery angle है, अजय देवगन और जयदीप अहलावत की मजबूत टक्कर है और कहानी आखिर तक curiosity बनाए रखती है।
लेकिन दृश्यम जैसी franchise से सिर्फ ठीक ठाक thriller की उम्मीद नहीं होती। यहां screenplay को कुछ जगह ज्यादा मेहनत करनी थी और emotional layer भी पहले दो पार्ट्स जितनी मजबूत नहीं बन पाई।
3 स्टार।
फिल्म विजय सलगांवकर की आखिरी बाजी जरूर दिखाती है, लेकिन इस बार हर चाल देखकर दर्शक के मुंह से “क्या दिमाग लगाया है” निकलना मुश्किल है।
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Rajni
Official editorial writer covering cinema box office, OTT streaming releases, Bollywood & Hollywood news, and pop culture for OnscreenBuzz.com.
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