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Prahaar Movie Review: कसाब बने ललित प्रभाकर ने रूह कंपा दी, राजकुमार राव नहीं छोड़ पाए खास छाप; 26/11 की दर्दनाक कहानी में नया क्या है?

ललित प्रभाकर ने अजमल कसाब के किरदार में चौंकाया, लेकिन राजकुमार राव का अभिनय नहीं छोड़ पाया खास छाप। 26/11 जैसी दिल दहला देने वाली घटना पर बनी ‘प्रहार’ में नया क्या है और फिल्म अपनी सबसे बड़ी चुनौती पर कहां चूकती है? पढ़िए पूरा रिव्यू।

✍️ By Rajni
• 📅 Oct 16, 2026 • ⏱️ 1 min read
Prahaar Movie Review: कसाब बने ललित प्रभाकर ने रूह कंपा दी, राजकुमार राव नहीं छोड़ पाए खास छाप; 26/11 की दर्दनाक कहानी में नया क्या है?
Media Desk / OnscreenBuzz.com


रेटिंग: 2.5/5 | ड्यूरेशन: 140 मिनट | डायरेक्टर: अविनाश अरुण | कास्ट: राजकुमार राव, ललित प्रभाकर, वामिका गब्बी, जयदीप अहलावत, सिकंदर खेर, आशीष विद्यार्थी

रिव्यू: कसाब की कहानी में ललित का कमाल, लेकिन ‘अनटोल्ड स्टोरी’ का दावा कमजोर

26/11 का नाम सुनते ही आज भी मुंबई की वो रात आंखों के सामने घूम जाती है, जब गोलियों की आवाज ने पूरे देश को दहला दिया था। ताज होटल से लेकर छत्रपति शिवाजी टर्मिनस तक, आतंकियों की दरिंदगी और बेगुनाहों की चीखें ऐसी यादें हैं, जिन्हें वक्त भी धुंधला नहीं कर पाया। उस हमले में जिंदा पकड़े गए आतंकवादी अजमल कसाब को कानून के रास्ते सजा दिलाने की लड़ाई भी भारतीय इतिहास का अहम अध्याय है।

लेकिन सवाल है कि क्या ‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम’ इस जानी-पहचानी कहानी में कोई नया पन्ना जोड़ती है? जवाब थोड़ा निराश करने वाला है। फिल्म में ललित प्रभाकर ने कसाब के किरदार को जिस अंदाज में निभाया है, वह चौंकाता है। दूसरी तरफ, राजकुमार राव का अभिनय अच्छा होने के बावजूद उज्ज्वल निकम के किरदार में कोई ऐसा नया रंग नहीं दिखता, जो लंबे समय से इस चर्चित वकील को देखते आ रहे दर्शकों को हैरान कर दे। सबसे बड़ी कमी यह है कि 26/11 जैसी दिल दहला देने वाली घटना पर बनी फिल्म दिल को उतनी बार नहीं छूती, जितनी बार छूना चाहिए था।

कहानी: उज्ज्वल निकम की बायोपिक या कसाब के मुकदमे की कहानी?

फिल्म की कहानी सरकारी वकील उज्ज्वल निकम (राजकुमार राव) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो 26/11 हमले के आरोपी अजमल कसाब (ललित प्रभाकर) को सजा दिलाने की कानूनी लड़ाई लड़ते हैं। कहानी में अदालत की कार्यवाही, सबूतों की अहमियत, बचाव पक्ष की दलीलें और इस मुकदमे से जुड़ी चुनौतियां दिखाई गई हैं।

इसके साथ उज्ज्वल निकम की पत्नी ज्योति (वामिका गब्बी) और बेटे अनिकेत (ऋत्विक साहोरे) के साथ उनके रिश्तों को भी जगह दी गई है। फिल्म यह दिखाना चाहती है कि देश के लिए बड़ी जिम्मेदारी निभाने वाले व्यक्ति की निजी जिंदगी पर इसकी कितनी कीमत पड़ती है।

मगर यहां फिल्म के नाम और उसकी कहानी के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा होता है। ‘द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम’ कहने के बाद उम्मीद होती है कि दर्शकों को उस वकील के बारे में कुछ ऐसा जानने को मिलेगा, जो पहले नहीं पता था। उनके काम करने के तरीके, मुकदमे की रणनीति, दबाव के बीच लिए गए फैसलों या उनके व्यक्तित्व के अनदेखे पहलुओं को गहराई से दिखाया जा सकता था।

लेकिन फिल्म का बड़ा हिस्सा कसाब के मुकदमे और उससे जुड़ी घटनाओं में गुजरता है। आम दर्शक 26/11, कसाब की गिरफ्तारी और मुकदमे के नतीजे से पहले ही परिचित हैं। ऐसे में फिल्म कुछ नया खोलने के बजाय जानी-पहचानी घटनाओं को दोबारा सामने रखती है। यही वजह है कि ‘अनटोल्ड स्टोरी’ का दावा कहानी देखने के बाद पूरी तरह सही नहीं लगता। फिल्म का केंद्र अगर कसाब या 26/11 के मुकदमे के कुछ अनदेखे पहलू होते, तो इसका शीर्षक भी कहानी के ज्यादा करीब होता।

एक्टिंग: ललित प्रभाकर ने कसाब के किरदार में अलग ही बेचैनी पैदा की

फिल्म का सबसे बड़ा सरप्राइज ललित प्रभाकर हैं। कसाब के किरदार को निभाते हुए वह उसे सिर्फ एक खौफनाक आतंकी की तरह पेश करने तक सीमित नहीं रहते। उनके हावभाव, चेहरे की बेचैनी और संवादों के बीच का ठहराव किरदार को एक अलग रूप देते हैं। उनका प्रदर्शन ऐसा है कि कई मौकों पर नजरें उन पर टिक जाती हैं।

कसाब को लेकर पहले भी खबरों, फुटेज और दूसरी प्रस्तुतियों में अलग-अलग चित्रण देखे गए हैं। ललित का अंदाज उनसे अलग महसूस होता है। वह किरदार को जरूरत से ज्यादा फिल्मी बनाने के बजाय एक असहज करने वाली सहजता के साथ पेश करते हैं। यही उनके अभिनय की सबसे बड़ी उपलब्धि है। कुछ दृश्यों में ऐसा लगता है कि उन्होंने किरदार के व्यवहार और मानसिकता को समझने में मेहनत की है। फिल्म में उनके हिस्से के कुछ पल लंबे समय तक याद रह सकते हैं।

राजकुमार राव की बात करें तो वह उज्ज्वल निकम के रूप में ठीक काम करते हैं। उनकी संवाद अदायगी और गंभीरता किरदार के अनुकूल है। लेकिन राजकुमार को हमने पहले भी कई गंभीर और वास्तविक जीवन से प्रेरित किरदारों में देखा है। इस फिल्म में उनका अभिनय उस परिचित दायरे से बहुत बाहर नहीं निकलता।

उज्ज्वल निकम खुद वर्षों से चर्चित मुकदमों के कारण लोगों की नजरों में रहे हैं। उनके बोलने के अंदाज और सार्वजनिक व्यक्तित्व से भी दर्शक परिचित हैं। ऐसे में राजकुमार से उम्मीद थी कि वह इस किरदार में कोई ऐसी परत जोड़ेंगे, जो निकम को नए नजरिए से समझने का मौका दे। वह अपना काम ईमानदारी से करते हैं, लेकिन इसे उनका ऐतिहासिक या करियर का सबसे यादगार प्रदर्शन कहना मुश्किल है।

वामिका गब्बी को सीमित दायरे में काम करना पड़ा है। जयदीप अहलावत, सिकंदर खेर और आशीष विद्यार्थी अपनी मौजूदगी से कहानी को मजबूती देते हैं, लेकिन पटकथा सभी कलाकारों को समान गहराई नहीं देती।

डायरेक्शन और स्क्रीनप्ले: बड़ी घटना, लेकिन भावनाओं की कमी

अविनाश अरुण ने फिल्म को गंभीर अंदाज में पेश किया है। अदालत की कार्यवाही और कानूनी प्रक्रिया को महत्व देना सही फैसला है, क्योंकि किसी आतंकवादी को सजा दिलाने की लड़ाई सिर्फ गुस्से या देशभक्ति के नारों से नहीं जीती जाती। सबूत, गवाह और कानून की प्रक्रिया इस कहानी के जरूरी हिस्से हैं।

लेकिन अदालत में होने वाली हर बहस अपने आप में सिनेमाई रोमांच नहीं बन जाती। इसके लिए स्क्रीनप्ले में तनाव, अप्रत्याशित मोड़ और किरदारों के भीतर चल रही उथल-पुथल को भी उभारना पड़ता है। ‘प्रहार’ कुछ जगह ऐसा करती है, मगर लगातार नहीं। कई दृश्यों में कहानी परिचित घटनाओं को आगे बढ़ाती रहती है, जबकि दर्शक किसी नई जानकारी या गहरे खुलासे की उम्मीद करता है।

फिल्म की दूसरी बड़ी कमजोरी भावनात्मक जुड़ाव है। 26/11 सिर्फ एक मुकदमा नहीं था। यह सैकड़ों परिवारों के जीवन में आया ऐसा तूफान था, जिसने कई लोगों को हमेशा के लिए बदल दिया। आज भी उस रात को याद करके रूह कांप जाती है। ऐसे विषय पर बनी फिल्म में पीड़ितों की तकलीफ, परिवारों का इंतजार और न्याय मिलने तक का मानसिक संघर्ष कहानी के केंद्र में होना चाहिए था।

फिल्म में कुछ दृश्य भावनात्मक असर पैदा करते हैं, लेकिन ऐसे पल कम हैं। जहां दिल को भारी कर देने वाली खामोशी होनी चाहिए थी, वहां कहानी कई बार फिर कानूनी प्रक्रिया की ओर मुड़ जाती है। उज्ज्वल निकम की निजी जिंदगी को भी ज्यादा गहराई से दिखाया जाता, तो दर्शक उनके संघर्ष से बेहतर तरीके से जुड़ पाते। नतीजा यह है कि फिल्म एक महत्वपूर्ण घटना को दिखाती जरूर है, लेकिन उसके दर्द को पूरी तीव्रता से महसूस नहीं करा पाती।

सिनेमैटोग्राफी और म्यूजिक: माहौल गंभीर, लेकिन असर सीमित

फिल्म की सिनेमैटोग्राफी अदालत और किरदारों के गंभीर माहौल के अनुरूप है। दृश्यों में अनावश्यक भव्यता नहीं है, लेकिन दृश्यात्मक स्तर पर ऐसा कुछ खास भी नहीं मिलता जो कहानी को नई ऊंचाई दे।

फिल्म में एक ही गाना ‘मेरे रहते’ है, जो अंत में आता है। यह समापन के भावनात्मक माहौल को आगे बढ़ाता है और फिल्म खत्म होने के बाद कुछ असर छोड़ता है। बैकग्राउंड स्कोर अदालत के तनाव को उभारने में मदद करता है, लेकिन जहां पटकथा खुद भावनात्मक गहराई पैदा करने में पीछे रह जाती है, वहां संगीत भी उस कमी को पूरी तरह नहीं भर पाता।

फाइनल वर्डिक्ट: ललित प्रभाकर के लिए देख सकते हैं, लेकिन नई कहानी की उम्मीद न रखें

‘प्रहार’ की सबसे बड़ी ताकत ललित प्रभाकर का असाधारण रूप से प्रभावशाली अभिनय है। उन्होंने कसाब के किरदार को एक अलग अंदाज दिया है। राजकुमार राव का काम भी अच्छा है, लेकिन उज्ज्वल निकम के रूप में वह कोई ऐसी छाप नहीं छोड़ते, जो पहले से बनी उनकी छवि को पूरी तरह बदल दे।

फिल्म का विषय बेहद महत्वपूर्ण है, मगर पटकथा में नए खुलासों की कमी और भावनात्मक दृश्यों का सीमित असर इसे औसत अनुभव बना देता है। 26/11 जैसी घटना पर बनी फिल्म से उम्मीद रहती है कि वह सिर्फ इतिहास दोहराए नहीं, बल्कि दर्शकों को उस इतिहास के किसी ऐसे पहलू से भी मिलवाए, जिसे उन्होंने पहले महसूस नहीं किया।

रेटिंग: 2.5/5 स्टार।

ललित प्रभाकर का अभिनय इस फिल्म को देखने की एक मजबूत वजह है। लेकिन अगर आप उज्ज्वल निकम की अनदेखी कहानी या 26/11 के मुकदमे के नए पहलुओं को जानने की उम्मीद लेकर जा रहे हैं, तो फिल्म आपको पूरी तरह संतुष्ट नहीं करेगी। जिस कहानी को ‘अनटोल्ड’ कहा गया है, उसमें सबसे ज्यादा कमी उसी नई बात की है, जिसके लिए दर्शक टिकट खरीदकर सिनेमाघर पहुंचता है।

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Rajni

Official editorial writer covering cinema box office, OTT streaming releases, Bollywood & Hollywood news, and pop culture for OnscreenBuzz.com.

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