भारत की रामायण, विदेशियों से प्यार, भारतीय पत्रकारों को दुत्कार! ग्लोबल बनने निकले मेकर्स, जिनकी कहानी उन्हीं को कर रहे नजरअंदाज
रामायण को ग्लोबल बनाने की होड़ में मेकर्स पर भारतीय पत्रकारों की अनदेखी के आरोप लग रहे हैं। उधर 'मंगल रंग' के कव्वाली अंदाज, कलाकारों के लुक और एआर रहमान के जवाब पर भी सवाल उठ रहे हैं। आखिर भारत की कहानी में भारतीयों को ही क्यों किया जा रहा है नजरअंदाज?
रामायण भारत की, किरदार भारत के, कहानी भारत की और आस्था भी भारत की, लेकिन फिल्म के मेकर्स को ग्लोबल पहचान की ऐसी जल्दी है कि अपने ही देश के पत्रकारों को घंटों इंतजार करवाना पड़ रहा है। विदेशी इन्फ्लुएंसर के लिए खास इंतजाम, हॉलीवुड में भव्य प्रीमियर, अंतरराष्ट्रीय दर्शकों को आकर्षित करने के लिए अलग रणनीति, लेकिन भारतीय मीडिया से संवाद के लिए पर्याप्त समय नहीं! ऊपर से एआर रहमान के संगीत में कव्वाली के कथित प्रभाव, सीता के परिधानों और दूसरे क्रिएटिव फैसलों पर सवाल। लगातार आलोचनाओं के बीच रहमान का जवाब भी चर्चा में है। सवाल है कि दुनिया को भारत की रामायण दिखाने निकले मेकर्स, आखिर अपने ही देश के लोगों से इतनी दूरी क्यों बना रहे हैं?
रामायण को दुनिया के सामने भव्य तरीके से पेश करना अच्छी बात है। भारतीय सिनेमा की पहुंच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़े, इससे बेहतर क्या हो सकता है। लेकिन ग्लोबल बनने की इस दौड़ में अगर अपने ही देश के लोगों को पीछे छोड़ दिया जाए, तो इस पूरी कवायद का मतलब समझना मुश्किल हो जाता है।
नितेश तिवारी के निर्देशन और नमित मल्होत्रा के निर्माण में बन रही रामायण को लेकर शुरुआत से ही बड़े बड़े दावे किए जा रहे हैं। हजारों करोड़ का बजट, हॉलीवुड के दिग्गजों की भागीदारी, अत्याधुनिक तकनीक, दुनिया की सबसे भव्य फिल्मों में शामिल होने की महत्वाकांक्षा और विदेशी बाजार में बड़ी पहचान बनाने की तैयारी।
लेकिन इस चमक दमक के बीच एक सवाल लगातार बड़ा होता जा रहा है। क्या मेकर्स को भारतीय दर्शकों और पत्रकारों से ज्यादा विदेशी मेहमानों की परवाह है?
जिस कहानी को भारत के लोगों ने पीढ़ियों से अपने घरों, मंदिरों, रामलीलाओं और धार्मिक आयोजनों में जिया है, उसी कहानी के मेकर्स अगर भारतीय पत्रकारों को ही महत्व नहीं देंगे, तो इसे कैसी ग्लोबल सोच कहा जाएगा?
मिस्टर बीस्ट के लिए चार घंटे इंतजार, भारतीय पत्रकारों को जाने की सलाह!
27 सितंबर को मुंबई में रामायण के प्रमोशनल इवेंट में दुनिया के चर्चित यूट्यूबर मिस्टर बीस्ट को बुलाया गया था। विदेशी सोशल मीडिया स्टार की मौजूदगी से फिल्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित करने का शानदार मौका था। लेकिन इस आयोजन ने भारतीय पत्रकारों के सामने मेकर्स की प्राथमिकताओं का एक अलग ही चेहरा रख दिया।
कार्यक्रम दोपहर 1:30 बजे शुरू होना था। पत्रकार समय पर पहुंच गए, लेकिन आयोजन करीब चार घंटे तक अटका रहा। वजह बताई गई कि मिस्टर बीस्ट की प्राइवेट फ्लाइट छूट गई थी।
अब सवाल यह नहीं कि किसी की फ्लाइट छूट गई तो कार्यक्रम में देरी क्यों हुई। सवाल यह है कि इस दौरान भारतीय पत्रकारों को इंतजार करवाने के अलावा कोई बेहतर व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
मीडिया प्रतिनिधियों को कथित तौर पर यह संदेश दिया गया कि जिन्हें जाना है, वे जा सकते हैं। इसके बाद कई पत्रकारों ने नाराजगी जताते हुए कार्यक्रम का बहिष्कार कर दिया। रणबीर कपूर ने भी पत्रकारों से जाने की बात कही। आखिरकार नमित मल्होत्रा को सामने आकर माफी मांगनी पड़ी।
जरा इस प्राथमिकता को समझिए। एक विदेशी इन्फ्लुएंसर के आने का इंतजार हो रहा है और दूसरी तरफ वे पत्रकार बैठे हैं, जिनके जरिए फिल्म की खबर देश के करोड़ों लोगों तक पहुंचनी है।
मिस्टर बीस्ट को बुलाना मेकर्स की मार्केटिंग रणनीति हो सकती है, लेकिन क्या भारतीय पत्रकारों का सम्मान उस रणनीति का हिस्सा नहीं होना चाहिए था?
विदेशी मेहमान के लिए इंतजार कीजिए, भारतीय पत्रकार को इंतजार करवाइए और फिर कह दीजिए कि जाना है तो जाइए! क्या यही है भारत की कहानी को ग्लोबल बनाने का तरीका?
हॉलीवुड में रेड कारपेट, अपने देश में पत्रकारों को इंटरव्यू के लिए इंतजार!
27 अक्टूबर को लॉस एंजिल्स के डेविड गेफेन थिएटर में रामायण का भव्य प्रीमियर हुआ। रणबीर कपूर, साई पल्लवी, यश, नमित मल्होत्रा और नितेश तिवारी सहित फिल्म की टीम अंतरराष्ट्रीय मंच पर मौजूद रही।
विदेशों में फिल्म का प्रचार हो, हॉलीवुड के बड़े नाम जुड़ें, दुनिया के दर्शक रामायण को देखें, इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन क्या भारतीय पत्रकारों को भी वही महत्व मिल रहा है?
भारतीय मीडिया के लिए कलाकारों के इंटरव्यू और मेकर्स के साथ बातचीत के पर्याप्त अवसरों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। आखिर रणबीर कपूर से उनके राम के किरदार पर सवाल कौन पूछेगा? साई पल्लवी से सीता की भूमिका को लेकर कौन बातचीत करेगा? यश से रावण के चरित्र की तैयारी कौन जानेगा? नितेश तिवारी से फिल्म की रचनात्मक सोच पर कौन सवाल करेगा?
अगर विदेशी मीडिया के सामने बातचीत के अवसर हैं, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रचार है और हॉलीवुड में भव्य आयोजन हैं, तो भारतीय पत्रकारों के लिए भी बराबर की व्यवस्था क्यों नहीं?
मेकर्स को शायद यह समझना होगा कि भारतीय पत्रकार कोई प्रचार सामग्री बांटने वाली एजेंसी नहीं हैं। वे सवाल पूछते हैं, आलोचना करते हैं और दर्शकों की जिज्ञासाओं को सामने रखते हैं।
जिन लोगों की कहानी है, जिनकी संस्कृति है और जिनकी आस्था के नाम पर फिल्म बनाई जा रही है, अगर उन्हीं लोगों को संवाद से दूर रखा जाएगा, तो यह ग्लोबल अपील नहीं, प्राथमिकताओं का अजीब विरोधाभास है।
विदेशियों के लिए अलग कट, अलग रणनीति, आखिर भारतीय दर्शकों के हिस्से क्या?
रिपोर्ट्स के मुताबिक रामायण के अंग्रेजी संस्करण को भारतीय भाषाओं वाले संस्करण से करीब 30 मिनट छोटा रखा गया है। अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के लिए कुछ हिस्सों और गानों को हटाने की रणनीति भी सामने आई है।
यानी विदेशी दर्शकों की पसंद और देखने के तरीके के हिसाब से फिल्म का अलग संस्करण तैयार करने पर विचार किया गया है।
यह एक व्यावसायिक फैसला हो सकता है। लेकिन इसके साथ एक सवाल भी जुड़ता है। जब विदेशी दर्शकों के लिए फिल्म की लंबाई, संगीत और प्रस्तुति तक बदली जा सकती है, तो भारतीय दर्शकों की अपेक्षाओं को समझने के लिए उतनी ही गंभीरता क्यों नहीं दिखाई जा रही?
हॉलीवुड के दर्शकों को आकर्षित करने के लिए हंस जिमर जैसे नाम को जोड़ा गया। विदेशी बाजार के लिए अलग कट तैयार किया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय प्रीमियर की भव्यता पर पूरा जोर है।
लेकिन भारतीय दर्शक जब सीता के लुक, राम के किरदार, संगीत और रामायण के प्रसंगों पर सवाल उठाते हैं, तो उन्हें सिर्फ सोशल मीडिया की आलोचना समझकर किनारे नहीं किया जा सकता।
विदेशियों की पसंद के हिसाब से फिल्म में बदलाव करना समझदारी है, लेकिन भारतीय दर्शकों की भावनाओं को समझना क्या जरूरी नहीं?
राम सीता के विवाह में कव्वाली का कथित रंग, एआर रहमान के संगीत पर उठे सवाल
फिल्म की मुश्किलें सिर्फ मार्केटिंग तक सीमित नहीं हैं। संगीत को लेकर भी सोशल मीडिया पर खूब बहस हो रही है।
एआर रहमान और हॉलीवुड के दिग्गज संगीतकार हंस जिमर की जोड़ी को फिल्म की बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश किया गया। लेकिन 'रावण तांडव' के बाद अब 'मंगल रंग' भी आलोचनाओं के घेरे में है।
अरिजीत सिंह और श्रेया घोषाल की आवाज में आए 'मंगल रंग' को भगवान राम और माता सीता के विवाह प्रसंग से जोड़ा गया है। लेकिन गाना रिलीज होते ही कुछ श्रोताओं ने इसके संगीत में कव्वाली और सूफियाना अंदाज के कथित प्रभाव पर सवाल उठाए। कई लोगों ने इसकी तुलना रहमान के पुराने गाने 'कुन फाया कुन' से भी की।
कुछ दर्शकों का सवाल है कि राम और सीता के विवाह जैसे पवित्र प्रसंग के लिए संगीत की ऐसी शैली क्यों चुनी गई, जबकि उनसे एक अलग तरह की पारंपरिक और भारतीय सांगीतिक अनुभूति की अपेक्षा थी।
बेशक संगीत में प्रयोग करने की स्वतंत्रता है। कव्वाली भी एक समृद्ध संगीत परंपरा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी भी प्रयोग को सिर्फ इसलिए स्वीकार कर लिया जाना चाहिए क्योंकि उसके पीछे एआर रहमान जैसा बड़ा नाम है?
जब कोई संगीतकार रामायण जैसे महाकाव्य पर काम करता है, तो उससे अपेक्षा होती है कि संगीत उस कहानी की आत्मा को महसूस कराए। दर्शकों को अगर गाने में प्रसंग से ज्यादा दूसरी संगीत शैलियों की छाप महसूस हो रही है, तो यह प्रतिक्रिया भी सुनी जानी चाहिए।
रहमान का जवाब, आलोचना करने वाले आज माफी मांग रहे हैं!
लगातार आलोचनाओं के बीच एआर रहमान ने भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि गानों को तैयार करने में काफी फिल्ट्रेशन, आइडिएशन और कई स्तरों पर बदलाव किए जाते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि उनका बेटा उन्हें कहता है कि कल आलोचना करने वाले लोग आज माफी मांग रहे हैं।
रहमान ने कहा कि उन्होंने अपना काम ईमानदारी से किया है और उम्मीद है कि लोग इसे सेलिब्रेट करेंगे।
लेकिन सवाल यह है कि क्या हर आलोचना का जवाब यही होना चाहिए कि बाद में आलोचक माफी मांगेंगे?
रहमान का संगीत भारतीय सिनेमा की बड़ी पहचान है। ऑस्कर से लेकर अंतरराष्ट्रीय सम्मान तक, उन्होंने अपनी प्रतिभा साबित की है। लेकिन किसी कलाकार की उपलब्धियां उसके नए काम को आलोचना से ऊपर नहीं कर देतीं।
दर्शक किसी गाने को पसंद नहीं करते, तो उन्हें अपनी राय रखने का अधिकार है। संगीतकार को प्रयोग करने का अधिकार है, तो श्रोता को उसे नापसंद करने का भी अधिकार है।
ऑस्कर की चमक दर्शकों के कानों पर पर्दा नहीं डाल सकती।
रामायण के संगीत पर सवाल उठे हैं, तो उसका जवाब संगीत से मिलना चाहिए। दर्शकों को यह महसूस होना चाहिए कि उनकी प्रतिक्रिया सुनी जा रही है, न कि उन्हें भविष्य में माफी मांगने वालों की सूची में शामिल किया जा रहा है।
सीता के कपड़े, रकुल प्रीत का शूर्पणखा लुक और किरदारों की प्रस्तुति पर बहस
फिल्म की कास्टिंग और कॉस्ट्यूम भी लगातार चर्चा में हैं। साई पल्लवी के सीता वाले लुक को लेकर सोशल मीडिया पर कई सवाल उठे। उनके परिधानों में आधुनिकता की झलक और ब्लाउज की डिजाइन को लेकर बहस हुई। लारा दत्ता के कैकेयी वाले लुक पर भी प्रतिक्रियाएं आईं।
अब रकुल प्रीत सिंह के शूर्पणखा वाले लुक को लेकर भी दर्शकों की दिलचस्पी और सवाल सामने आ रहे हैं।
कॉस्ट्यूम डिजाइनर रिम्पल और हरप्रीत नरूला ने अपनी डिजाइन प्रक्रिया के पीछे मंदिरों की कलाकृतियों और राजा रवि वर्मा की पेंटिंग्स से प्रेरणा लेने की बात कही है।
लेकिन दर्शकों का सवाल अपनी जगह है। जब फिल्म को भारतीय महाकाव्य की सबसे भव्य प्रस्तुति बताया जा रहा है, तो उसके किरदारों के लुक में ऐसी सांस्कृतिक विश्वसनीयता भी दिखनी चाहिए, जिसे देखकर दर्शक उस दुनिया से जुड़ सकें।
यहां सिर्फ महंगे आभूषण, शानदार कपड़े और चमकदार विजुअल्स काफी नहीं हैं। रामायण की दुनिया बनाने के लिए उस दौर की कल्पना, मर्यादा और सांस्कृतिक समझ भी जरूरी है।
रणबीर के पुराने बयान से साई पल्लवी के विवाद तक, सवालों से बचने का रास्ता कब तक?
रणबीर कपूर का 2011 में बीफ खाने से जुड़ा पुराना बयान 2022 में ब्रह्मास्त्र के प्रमोशन के दौरान फिर चर्चा में आया था। उज्जैन के महाकाल मंदिर में उनके दौरे को लेकर विरोध भी हुआ था।
साई पल्लवी का 2022 में भारतीय सेना और हिंसा को लेकर दिया गया बयान भी 2024 में दोबारा विवाद का विषय बना। उनके बयान की अलग अलग व्याख्याएं सामने आईं और सोशल मीडिया पर बहस हुई।
अब रणबीर भगवान राम और साई पल्लवी माता सीता की भूमिका में हैं। कलाकारों को किरदार निभाने का पूरा अधिकार है, लेकिन दर्शकों को उनके पुराने सार्वजनिक बयानों पर सवाल पूछने का भी अधिकार है।
मेकर्स के लिए बेहतर यही होता कि वे भारतीय मीडिया से खुलकर बातचीत करते। कलाकारों को दर्शकों की जिज्ञासाओं का जवाब देने का अवसर मिलता और फिल्म को लेकर पैदा हो रहे भ्रम भी दूर होते।
लेकिन जब बातचीत के अवसर ही सीमित होंगे, तो सवाल और अटकलें तो बढ़ेंगी ही।
रामायण को ग्लोबल बनाने की धुन में कहीं भारत ही पीछे तो नहीं छूट रहा?
अब पूरे मामले को एक साथ रखकर देखिए।
मिस्टर बीस्ट के लिए खास आयोजन, भारतीय पत्रकारों का घंटों इंतजार, विदेशी बाजार के लिए अलग रणनीति, हॉलीवुड में भव्य प्रीमियर, अंतरराष्ट्रीय संगीतकारों के नाम, और दूसरी तरफ भारतीय दर्शकों की आलोचनाओं से घिरे गाने, कॉस्ट्यूम और किरदारों की प्रस्तुति।
क्या मेकर्स की प्राथमिकताएं कुछ ज्यादा ही एकतरफा दिखाई नहीं दे रही हैं?
नमित मल्होत्रा को यह समझना होगा कि ग्लोबल ब्रांड बनाने के लिए सिर्फ विदेशी चेहरे, विदेशी मंच और हॉलीवुड की चमक काफी नहीं है। जिस कहानी को वे दुनिया के सामने पेश कर रहे हैं, उसकी सबसे बड़ी ताकत भारत की सांस्कृतिक विरासत है।
भारतीय पत्रकारों का सम्मान करना, कलाकारों को सवालों के लिए उपलब्ध कराना और दर्शकों की आलोचना को गंभीरता से लेना भी उसी रणनीति का हिस्सा होना चाहिए।
विदेशी तारीफें हासिल करना अच्छी बात है, लेकिन अपने ही देश में सवाल पूछने वालों को असुविधा मानना ठीक नहीं। दुनिया को प्रभावित करने की कोशिश में अगर अपने लोगों को ही दूर रखा जाएगा, तो फिर यह सवाल उठेगा ही कि आखिर यह फिल्म किसके लिए बनाई जा रही है?
रामायण भारत की है, इसे ग्लोबल बनाइए, लेकिन भारतीयों को ही पराया मत बनाइए। जिनकी आस्था, जिनकी संस्कृति और जिनकी कहानी के नाम पर हजारों करोड़ का सिनेमाई प्रोजेक्ट तैयार हो रहा है, उन्हें ही दरवाजे के बाहर खड़ा करके दुनिया को अंदर बुलाने का क्या मतलब?
हॉलीवुड का रेड कारपेट अपनी जगह है, लेकिन भारतीय पत्रकारों का सम्मान भी उतना ही जरूरी है। विदेशी दर्शकों की तारीफ अपनी जगह है, लेकिन भारतीय दर्शकों का भरोसा उससे कहीं ज्यादा अहम है।
क्योंकि रामायण की सबसे बड़ी ताकत हॉलीवुड की तालियां नहीं, भारत के करोड़ों लोगों का उससे भावनात्मक रिश्ता है। और इस रिश्ते को किसी ग्लोबल मार्केटिंग अभियान से खरीदा नहीं जा सकता।
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Rajni
Official editorial writer covering cinema box office, OTT streaming releases, Bollywood & Hollywood news, and pop culture for OnscreenBuzz.com.
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