ONSCREENBUZZ
BUZZ

तन पर लिखा ‘राम’, अब देश ने भी पढ़ी कहानी: छत्तीसगढ़ की रामनामी परंपरा पर बनी डॉक्यूमेंट्री को मिला नेशनल अवॉर्ड

छत्तीसगढ़ के रामनामी समुदाय की अनोखी आस्था पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘राम-नामी’ को 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री का सम्मान मिला। जानिए शरीर पर रामनाम लिखने की इस अनोखी परंपरा की पूरी कहानी।

✍️ By Rajni
• 📅 Sep 24, 2026 • ⏱️ 1 min read
🎥 Featured Video / OnscreenBuzz.com


सोचिए, किसी मंदिर की दीवार पर नहीं, किसी किताब के पन्ने पर नहीं… बल्कि इंसान की अपनी त्वचा पर ‘राम’ लिखा हो।

एक-दो बार नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी के लिए।

छत्तीसगढ़ के रामनामी समुदाय की आस्था कुछ ऐसी ही है। यहां राम सिर्फ पूजा में नहीं हैं, राम नाम जीवन का हिस्सा है, पहचान का हिस्सा है और कई लोगों के लिए शरीर पर हमेशा के लिए दर्ज एक विश्वास है।

अब इसी अनोखी आस्था, परंपरा और जीवन की कहानी ने देश के सबसे बड़े फिल्म सम्मानों में अपनी जगह बना ली है। रामनामी समुदाय पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘राम-नामी’ को 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री का सम्मान मिला है।

22 सितंबर को गुजरात के एकता नगर में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने फिल्म के निर्देशक भारतबाला गणपति को यह सम्मान प्रदान किया। फिल्म को रजत कमल और 2 लाख रुपये की पुरस्कार राशि दी गई।

लेकिन असली कहानी अवॉर्ड की चमक से कहीं आगे है।

क्योंकि यह सिर्फ एक डॉक्यूमेंट्री नहीं, बल्कि उस समुदाय की कहानी है जिसने अपनी आस्था को इतना करीब रखा कि उसे अपने शरीर पर ही लिख लिया।

आखिर कौन हैं रामनामी?

छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों में रहने वाला रामनामी समुदाय अपनी विशिष्ट धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा के लिए जाना जाता है।

इस समुदाय के कई लोग अपने शरीर पर ‘राम’ नाम का गोदना करवाते हैं। किसी के माथे पर रामनाम नजर आता है, किसी के हाथ पर, किसी के सीने पर और किसी के शरीर के बड़े हिस्से पर।

यहां ‘राम’ सिर्फ एक नाम नहीं है।

यह आस्था है।

यह पहचान है।

यह जीवन जीने का तरीका है।

यही वजह है कि रामनामी समुदाय को देखते हुए सबसे पहले नजर शरीर पर लिखे अक्षरों पर जाती है, लेकिन कहानी समझने के लिए उन अक्षरों के पीछे छिपे इतिहास तक पहुंचना पड़ता है।

एक मंदिर से शुरू हुई कहानी, जो शरीर तक पहुंच गई

रामनामी परंपरा की शुरुआत को लेकर करीब 1890 के आसपास की एक घटना का जिक्र मिलता है।

कहा जाता है कि परसराम भारद्वाज, जो दलित समुदाय से थे, उन्हें एक मंदिर में प्रवेश करने से रोक दिया गया था। इसके बाद उन्होंने अपने शरीर पर ‘राम’ नाम अंकित किया।

धीरे-धीरे यह सिर्फ एक व्यक्ति की आस्था नहीं रही। दूसरे लोगों ने भी इसे अपनाया और देखते ही देखते शरीर पर रामनाम लिखना एक विशिष्ट परंपरा का रूप लेने लगा।

यानी जहां मंदिर के दरवाजे बंद हुए, वहां शरीर ही आस्था का मंदिर बन गया—यह इस परंपरा की ऐतिहासिक व्याख्या का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

हालांकि इस परंपरा से जुड़ी ऐतिहासिक कथा को समुदाय और फिल्मकारों द्वारा प्रस्तुत संदर्भ में ही समझना जरूरी है।

‘राम-नामी’ में सिर्फ शरीर पर लिखे अक्षर नहीं हैं

यही वह जगह है जहां भारतबाला गणपति की डॉक्यूमेंट्री दिलचस्प हो जाती है।

अगर कैमरा सिर्फ शरीर पर लिखे ‘राम’ को दिखाकर आगे बढ़ जाता, तो शायद कहानी अधूरी रह जाती।

‘राम-नामी’ उन अक्षरों के पीछे खड़े इंसानों को देखने की कोशिश करती है।

उनका जीवन कैसा है?

उनकी आस्था उनके रोजमर्रा के जीवन को कैसे प्रभावित करती है?

पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा उनके लिए क्या मायने रखती है?

फिल्म इन्हीं सवालों के बीच रामनामी समुदाय की दुनिया में प्रवेश करती है।

भारतबाला को इस कहानी की ओर खींचने वाली एक अहम कड़ी फ्रेंच फोटोग्राफर यैनिक कॉर्मियर की रामनामी समुदाय पर की गई तस्वीरें थीं। इन तस्वीरों ने उनके भीतर जिज्ञासा पैदा की और वह इस समुदाय को कैमरे के जरिए करीब से समझने छत्तीसगढ़ पहुंचे।

शुरुआत में लक्ष्य किसी पुरस्कार तक पहुंचना नहीं था।

लक्ष्य था—एक ऐसी जिंदगी को समझना, जिसमें आस्था सिर्फ महसूस नहीं की जाती, बल्कि त्वचा पर दिखाई देती है।

रामनाम सिर्फ शरीर पर नहीं, जीवन में भी

रामनामी समुदाय की खासियत को सिर्फ गोदने तक सीमित कर देना इस कहानी को छोटा कर देगा।

यहां रामनाम धार्मिक विश्वास के साथ-साथ सामुदायिक पहचान और परंपरा का भी हिस्सा है। पीढ़ियां बदलती रहीं, समय बदला, समाज बदला, लेकिन शरीर पर रामनाम दर्ज करने की परंपरा अपनी अलग पहचान बनाए रही।

यही चीज डॉक्यूमेंट्री को महज एक सांस्कृतिक रिकॉर्ड से आगे ले जाती है।

कैमरे के सामने दिखाई देता है एक शरीर, लेकिन उसके पीछे सुनाई देती है कई पीढ़ियों की कहानी।

कहानी को आवाज मिली कैलाश खेर की

‘राम-नामी’ की भावनात्मक दुनिया को आवाज देने में कैलाश खेर की भी अहम भूमिका है।

फिल्म के लिए उन्होंने ‘राम ही पार लगावेंगे’ गीत को अपनी आवाज दी है।

भारतबाला और कैलाश खेर का यह सहयोग भी किसी तय फिल्मी मीटिंग से नहीं, बल्कि एयरपोर्ट पर हुई बातचीत से शुरू हुआ था।

यानी जिस फिल्म की कहानी जमीन से जुड़ी एक लोक परंपरा से निकलती है, उसकी आवाज भी एक सहज मुलाकात से फिल्म का हिस्सा बन जाती है।

फिल्म की टीम में सिनेमैटोग्राफर सुदीप एलामोन, म्यूजिक कंपोजर और अतिरिक्त वोकल्स के लिए Varkey, एडिटर क्रिस्टी सेबastian और कलरिस्ट अभिजीत देवलेकर समेत कई कलाकार और तकनीशियन शामिल रहे।

नेशनल अवॉर्ड मिलने पर भारतबाला ने क्या कहा?

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिलने के बाद भारतबाला गणपति ने इस सम्मान को अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि के तौर पर देखने के बजाय रामनामी समुदाय से जोड़कर देखा।

उनके लिए यह सम्मान उन लोगों का भी है, जिन्होंने अपने घर, अपने जीवन और अपनी परंपरा के दरवाजे फिल्म की टीम के लिए खोले।

भारतबाला की सोच में डॉक्यूमेंट्री सिर्फ कैमरे से तस्वीरें रिकॉर्ड करने का माध्यम नहीं है। यह उन आवाजों, यादों और परंपराओं को सहेजने का जरिया भी है, जो समय के साथ कहीं पीछे छूट सकती हैं।

और शायद यही इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत भी है—इसमें कैमरा कहानी पर हावी नहीं होता, बल्कि कहानी को बोलने की जगह देता है।

छत्तीसगढ़ में भी खुशी की लहर

‘राम-नामी’ को राष्ट्रीय सम्मान मिलने के बाद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने फिल्म की पूरी टीम को बधाई दी।

उन्होंने इसे छत्तीसगढ़ के लिए गौरव का क्षण बताया और रामनामी समुदाय की आस्था को उसकी विशिष्ट पहचान से जोड़ा। उनके संदेश के मुताबिक, समुदाय के लोगों के तन पर अंकित ‘राम’ सिर्फ अक्षर नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था, साधना और समर्पण की पहचान है।

राज्य के संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने भी इस सम्मान पर खुशी जताते हुए इसे रामनामी समुदाय की सांस्कृतिक परंपरा और छत्तीसगढ़ की लोक विरासत को मिली राष्ट्रीय पहचान बताया।

वहीं वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने भी डॉक्यूमेंट्री की टीम को बधाई दी और कहा कि फिल्म के जरिए रामनामी समाज की संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है।

एक शरीर पर लिखा नाम, अब देश की स्मृति में दर्ज

‘राम-नामी’ की असली खूबसूरती शायद इसके शीर्षक में ही छिपी है।

रामनामी।

एक ऐसा नाम जो कभी शरीर पर लिखा गया था।

फिर पीढ़ियों तक चलता रहा।

फिर तस्वीरों में आया।

फिर कैमरे ने उसे देखा।

और अब वही कहानी राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के मंच तक पहुंच गई।

रामनामी समुदाय की कहानी सिर्फ इस बात की कहानी नहीं कि लोग अपने शरीर पर ‘राम’ लिखवाते हैं।

यह उस आस्था की कहानी है जो शरीर और जीवन के बीच की दूरी मिटा देती है।

यह पहचान की कहानी है।

यह परंपरा की कहानी है।

और यह उस विश्वास की कहानी है, जिसे लोग सिर्फ मंदिर तक नहीं रखते—अपने साथ लेकर चलते हैं।

कभी शरीर पर लिखा गया एक नाम आज सिनेमा के जरिए देश के सामने है।

रामनाम पहले तन पर दर्ज था… अब उसकी कहानी भारतीय सिनेमा के इतिहास में भी दर्ज हो गई है।

Loved this story? Share with your friends!

Spread the word across your favorite social networks.

R

Rajni

Official editorial writer covering cinema box office, OTT streaming releases, Bollywood & Hollywood news, and pop culture for OnscreenBuzz.com.

🔥 Related Articles & Recommended Stories

More stories from Chattisgarhi Cinema

View Section →
Chattisgarhi Cinema 🇬🇧 English

The Name ‘Ram’ Written on the Body, Now Etched in National Cinema: Chhattisgarh’s Ramnami Tradition Wins a National Film Award

Chhattisgarh’s Ramnami community, known for inscribing the name of Ram on their bodies, takes centre stage as Bharatbala Ganapathy’s documentary ‘Ram-Nami’ wins Best Documentary at the 72nd National Film Awards.

📅 Sep 24
Ranbir Kapoor’s ‘Love & War’ First Look Is Here! Bloodied Arm, Vintage Car and Retro Avatar Leave Fans Full of Questions
Bollywood 🇬🇧 English

Ranbir Kapoor’s ‘Love & War’ First Look Is Here! Bloodied Arm, Vintage Car and Retro Avatar Leave Fans Full of Questions

Ranbir Kapoor’s first look from Sanjay Leela Bhansali’s ‘Love & War’ is finally here. His vintage avatar, sunglasses and bloodied arm have left fans wondering what happened to his character.

📅 Sep 24
Aryan Khan Is Bringing ‘The Ba***ds of Bollywood’ Back! Season 2 Reportedly Goes on Floors in March 2027, Original Cast Set to Return
Bollywood 🇬🇧 English

Aryan Khan Is Bringing ‘The Ba***ds of Bollywood’ Back! Season 2 Reportedly Goes on Floors in March 2027, Original Cast Set to Return

Aryan Khan’s ‘The Ba***ds of Bollywood’ is reportedly returning for Season 2, with production expected to begin in March 2027 and the original recurring cast set to return.

📅 Sep 24
Bollywood 🇬🇧 English

Ayushmann Khurrana Forgets He’s a Pakistani Spy and Starts Fighting for India! ‘Udta Teer’ Trailer Serves a Wild Mix of Spies, Memory Loss and Madness

Ayushmann Khurrana plays a Pakistani spy who loses his memory and starts believing he is an Indian intelligence officer in ‘Udta Teer’. Here’s everything revealed by the new trailer.

📅 Sep 24