द वन मूवी रिव्यू: वन देवी के जंगल में घुसी कहानी, लेकिन रहस्य से ज्यादा कन्फ्यूजन मिला; 136 मिनट में फिल्म खुद ही अपने रास्ते से भटक गई
‘द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ का आइडिया दिलचस्प है, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले, बिखरी कहानी और फीके रहस्य ने वन देवी की इस लोककथा का असर काफी कम कर दिया।
रेटिंग: ★½☆☆☆
किसी फिल्म के पास अगर बिहार की लोककथा, वन देवी का रहस्य, छठी मइया की आस्था, जंगल, रहस्यमयी ताकतें और एक बड़े स्टार का साथ हो, तो उम्मीद बनना स्वाभाविक है। ‘द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ भी शुरुआत में ऐसा ही भरोसा जगाती है। लेकिन समस्या यह है कि फिल्म के पास कहने को बहुत कुछ है और उसे कहने का तरीका उतना मजबूत नहीं।
नतीजा? जिस जंगल में रहस्य होना चाहिए था, वहां धीरे-धीरे कन्फ्यूजन बढ़ता जाता है।
कहानी में आइडिया बहुत, पकड़ कम
ऋषि (सिद्धार्थ मल्होत्रा) अपनी पत्नी ममता (तमन्ना भाटिया) के साथ बिहार के पुश्तैनी गांव लौटता है। परिवार, जमीन, छठ पूजा और जंगल से जुड़ी पुरानी मान्यताएं कहानी को जमीन देती हैं। वन देवी से जुड़ी लोककथा और सूर्यास्त के बाद जंगल में न जाने की मान्यता शुरुआत में फिल्म को एक अच्छा रहस्य देती है।
यहीं तक सब ठीक है।
ऋषि का शहर वाला नजरिया, गांव की आस्था और जंगल बचाने बनाम विकास का सवाल—इन सबमें एक अच्छी फिल्म बनने की पूरी संभावना थी। लेकिन फिल्म धीरे-धीरे इन मजबूत बातों को छोड़कर अच्छाई बनाम बुराई की सीधी लड़ाई में चली जाती है।
सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि शुरुआत में जो जमीन और जंगल का संघर्ष असली और दिलचस्प लगता है, वह बाद में अलौकिक घटनाओं के नीचे दब जाता है। कई आइडिया आते हैं, लेकिन उन्हें पूरी तरह विकसित करने के बजाय फिल्म अगले रहस्य की तरफ भाग जाती है।
रहस्य खुलता है, रोमांच नहीं
पहले हाफ में कुछ दृश्य सचमुच माहौल बनाते हैं। गांव, जंगल, वन देवी की कहानी और रात के सन्नाटे में होने वाली घटनाएं उत्सुकता पैदा करती हैं।
लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, रहस्य की जगह एक के बाद एक खुलासे और VFX वाले एक्शन लेने लगते हैं। जिस चीज को धीरे-धीरे डर और कौतूहल में बदलना चाहिए था, उसे फिल्म कई बार खुद ही समझा देती है।
और जब रहस्य खुद ही इतनी जल्दी अपना राज बता दे, तो दर्शक आखिर डरे किस बात से?
कई समीक्षाओं ने भी फिल्म के इसी बदलाव को रेखांकित किया है—शुरुआत के लोककथा और पर्यावरण वाले विचार बाद में ज्यादा पारंपरिक सुपरनैचुरल संघर्ष में बदल जाते हैं।
सिद्धार्थ ठीक, किरदार कमजोर
सिद्धार्थ मल्होत्रा स्क्रीन पर अच्छे लगते हैं और एक्शन उनके लिए नया नहीं है। लेकिन ऋषि का अंदर से बदलना जितना महत्वपूर्ण होना चाहिए था, उतना महसूस नहीं होता। वह एक मजबूत हीरो तो दिखते हैं, लेकिन एक ऐसे आदमी के रूप में कम असर छोड़ते हैं जिसकी पूरी सोच हिल रही है।
तमन्ना भाटिया के पास करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है। उनका किरदार कहानी में भावनात्मक जगह बना सकता था, लेकिन स्क्रीनप्ले उसे वहां तक पहुंचने ही नहीं देता।
सुनील ग्रोवर को गंभीर भूमिका में देखने की शुरुआत दिलचस्प लगती है, लेकिन उनके किरदार का ट्विस्ट कहानी को मजबूत करने के बजाय कुछ हद तक उसका असर और कम कर देता है।
मनीष पॉल को जितनी देर स्क्रीन पर हल्का-फुल्का स्पेस मिलता है, वह फिल्म के भारी माहौल में थोड़ी जान डाल देते हैं।
डायरेक्शन और स्क्रीनप्ले: यहीं सबसे बड़ा जंगल है
दीपक कुमार मिश्रा ने एक अच्छी लोककथा चुनी है, लेकिन अच्छी लोककथा अपने आप अच्छी फिल्म नहीं बन जाती।
फिल्म में आस्था भी है, प्रकृति भी, परिवार भी, विकास भी, रहस्य भी और फैंटेसी भी। लेकिन इन सबको जोड़ने वाली कहानी कई जगह कमजोर पड़ जाती है।
खासकर दूसरे हिस्से में ऐसा लगता है कि फिल्म के पास बहुत सारे जवाब हैं, लेकिन सही सवाल कम होते जा रहे हैं।
फिल्म अगर अपने लोककथा वाले हिस्से पर ज्यादा भरोसा करती, जंगल के रहस्य को थोड़ा और समय देती और हर चीज को बड़े VFX सेट पीस में बदलने की कोशिश नहीं करती, तो इसका असर कहीं ज्यादा हो सकता था।
जंगल खूबसूरत, VFX उतने नहीं
यहां फिल्म को कुछ नंबर जरूर मिलते हैं।
मनु आनंद की सिनेमैटोग्राफी जंगल को खूबसूरत और रहस्यमयी बनाती है। धुंध, पेड़ों की छाया और अंधेरे का इस्तेमाल अच्छा है। कुछ शॉट्स में सचमुच लगता है कि जंगल कहानी का हिस्सा है।
लेकिन फिर VFX आते हैं।
कुछ अलौकिक दृश्य ठीक लगते हैं, जबकि कुछ जगह ऐसा महसूस होता है कि कल्पना बड़ी थी, लेकिन उसे पर्दे पर उतारने की फिनिश उतनी बड़ी नहीं हो पाई। फिल्म का स्केल बड़ा है, मगर हर बड़ा दृश्य प्रभावशाली नहीं बन पाता।
और भूतक्काओं की कहानी समझाने वाला एनीमेशन आइडिया जरूर दिलचस्प है, लेकिन उसकी प्रस्तुति भी फिल्म के बाकी हिस्सों जितनी polished नहीं लगती।
छठी मइया और वन देवी—अच्छा आधार, अधूरा असर
फिल्म में छठ पूजा और छठी मइया का इस्तेमाल इसे बिहार की मिट्टी से जोड़ता है। भक्ति वाले हिस्से में एक सांस्कृतिक रंग आता है और यह फिल्म के बाकी फैंटेसी संसार से अलग पहचान बनाता है।
लेकिन यहां भी फिल्म कई बार भावना से ज्यादा दृश्य बनाने में व्यस्त दिखती है। वन देवी की लोककथा के पास जितनी रहस्यमय ताकत थी, फिल्म उसे पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर पाती।
यही सबसे बड़ी निराशा है—फिल्म के पास कहानी कम नहीं थी, कहानी को संभालने वाली पकड़ कम थी।
फाइनल वर्डिक्ट
‘द वन’ को देखकर सबसे ज्यादा अफसोस इस बात का होता है कि इसमें एक बहुत अच्छी फिल्म बनने की सामग्री साफ दिखाई देती है।
बिहार की लोककथा, वन देवी, छठी मइया, जंगल, प्रकृति, आस्था और आधुनिक सोच के बीच टकराव—ये सब मिलकर एक शानदार देसी फैंटेसी बना सकते थे। लेकिन फिल्म इन धागों को खूबसूरती से बुनने के बजाय कई बार एक साथ खींच देती है।
पहला हाफ उम्मीद जगाता है। दूसरा हाफ उस उम्मीद का पीछा करते-करते कई बार रास्ता बदल देता है।
नतीजा एक ऐसी फिल्म है जो देखने में बड़ी लगती है, लेकिन कहानी में उतनी बड़ी नहीं बन पाती।
अगर आपको सिर्फ बड़े पर्दे का VFX, जंगल और सुपरनैचुरल तमाशा चाहिए तो कुछ पल काम आ सकते हैं। लेकिन अगर आप एक ऐसी लोककथा की उम्मीद लेकर जा रहे हैं जिसमें रहस्य धीरे-धीरे खुले, किरदार गहरे हों और अंत तक कहानी का असर बना रहे—तो यहां निराशा हाथ लग सकती है।
‘द वन’ में जंगल बहुत है, लेकिन कहानी को रास्ता दिखाने वाला compass कम है।
रेटिंग: ★½☆☆☆
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Rajni
Official editorial writer covering cinema box office, OTT streaming releases, Bollywood & Hollywood news, and pop culture for OnscreenBuzz.com.
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