‘वाइब’ देखने बैठे थे, लेकिन फिल्म ने ऐसा झटका दिया कि इंटरवल तक हंसी और अंत तक सिरदर्द—कुणाल खेमू की ये कैसी खिचड़ी है?
कुणाल खेमू की ‘वाइब’ शुरुआत में मजेदार लगती है, लेकिन कहानी आगे बढ़ते-बढ़ते इतनी चीजें जोड़ लेती है कि एंटरटेनमेंट पीछे छूट जाता है।
रेटिंग: ⭐½ 1.5/5
अवधि: लगभग 2 घंटे
प्लेटफॉर्म: ओटीटी
परिचय
‘वाइब’ के पास शुरुआत में वो सब कुछ है जो एक हल्की-फुल्की, मजेदार और मसाला फिल्म को चाहिए—कुणाल खेमू, अतरंगी किरदार, कॉमेडी और एक ऐसा माहौल जो आपको बिना ज्यादा सोचे बैठकर एंटरटेन कर सके। दिक्कत बस इतनी है कि फिल्म खुद भी तय नहीं कर पाती कि उसे आखिर बनना क्या है।
कहानी
कहानी का सेंटर है हार्दिक (कुणाल खेमू), जिसके साथ बग्स (स्पर्श श्रीवास्तव) और करीना (वंशिका धीर) जैसे किरदार जुड़े हैं। शुरुआत में मामला काफी मजेदार और हल्का रहता है, लेकिन धीरे-धीरे फिल्म कॉमेडी से निकलकर गैंगस्टर, एआई, सॉफ्टवेयर अटैक, साजिश और सीरम जैसी चीजों में घुसती चली जाती है।
यहीं से ‘वाइब’ की असली दिक्कत शुरू होती है—कहानी आगे बढ़ने के बजाय सामान जोड़ती जाती है। एक ट्विस्ट के बाद दूसरा ट्विस्ट आता है, लेकिन मजा बढ़ने के बजाय कन्फ्यूजन बढ़ता जाता है।
एक्टिंग
कुणाल खेमू अपनी कॉमिक टाइमिंग और स्क्रीन प्रेजेंस से फिल्म को काफी हद तक संभालते हैं। उनके हिस्से के कई पल सच में हंसाते हैं। स्पर्श श्रीवास्तव भी अपने अंदाज में अच्छे लगते हैं।
प्रीति जिंटा का मैडम एच वाला किरदार दिलचस्प है, जबकि यशपाल शर्मा, दिनेश लाल यादव और शर्मिला टैगोर जैसे कलाकारों की मौजूदगी फिल्म को वजन देती है। लेकिन इतने कलाकारों के बावजूद स्क्रिप्ट उन्हें पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर पाती।
डायरेक्शन और स्क्रीनप्ले
पहला हिस्सा फिल्म का सबसे बेहतर हिस्सा है। कॉमेडी और किरदारों की केमिस्ट्री से माहौल बनता है। लेकिन दूसरे हिस्से में स्क्रीनप्ले जैसे एक्सेल शीट बन जाता है—हर थोड़ी देर में एक नया आइडिया डाल दो।
गैंगस्टर से एआई, एआई से सॉफ्टवेयर अटैक और फिर साजिश—फिल्म लगातार कुछ बड़ा करने की कोशिश करती है, लेकिन आखिर में यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है।
टेक्निकल और म्यूजिक
फिल्म का ट्रीटमेंट कुछ जगह स्टाइलिश है और कॉमेडी वाले सीक्वेंस में एडिटिंग और बैकग्राउंड स्कोर माहौल बनाने में मदद करते हैं। लेकिन तकनीकी चमक कमजोर स्क्रीनप्ले की समस्या को छुपा नहीं पाती। म्यूजिक ठीक-ठाक है, लेकिन ऐसा नहीं कि फिल्म खत्म होने के बाद याद रह जाए।
क्या खटकता है?
सबसे बड़ी परेशानी है फिल्म का ओवरलोडेड होना। ‘वाइब’ को जितना सिंपल और मजेदार रखा जा सकता था, उतना ही उसे उलझा दिया गया है। कई ट्विस्ट असरदार होने के बजाय सिर्फ कहानी को लंबा करते हैं और दूसरे हिस्से में कॉमेडी का असर भी कम हो जाता है।
फाइनल वर्डिक्ट
‘वाइब’ की शुरुआत देखकर लगता है कि शायद आज कुछ हल्का-फुल्का मजा मिलेगा, लेकिन फिल्म आगे बढ़ते-बढ़ते कॉमेडी की प्लेट में क्राइम, एआई, साजिश और टेक्नोलॉजी सब कुछ एक साथ परोस देती है। कुणाल खेमू और कुछ मजेदार पल फिल्म को पूरी तरह डूबने से बचाते हैं, लेकिन कमजोर और जरूरत से ज्यादा उलझी कहानी के कारण ‘वाइब’ में वाइब कम और कन्फ्यूजन ज्यादा है।
रेटिंग: ⭐½ 1.5/5
Ll
Rajni
Official editorial team covering cinema box office, OTT streaming releases, Hollywood news, and pop culture for OnscreenBuzz.com.
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